जैन धर्म में त्रिरत्न की अवधारणा क्या है ?

Abhishek Jain
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जैन धर्म में त्रिरत्न की अवधारणा क्या है ?

जैन धर्म मे त्रिरत्न की अवधारणा है , इस अवधारणा के अनुसार जीव को मुक्ति के प्रयास के लिए त्रिरत्न मे आस्था होनी चाहिए ।




सम्यक ज्ञान , सम्यक दर्शन , सम्यक चरित्र


जैन मान्यतानुसार केवल ज्ञान (only knowledge) ही मुक्ति कारक नही होता है ,इसके लिए जिन देव के वचनो में श्रद्धा तथा सही आचरण भी आवश्यक होता है ।


आप ऐसा मान लो की एक के बिना बाकी दो अधूरे है । सम्पूर्ण धर्म ज्ञान , दर्शन , चरित्र से ही पूर्ण होता है और वो भी सम्यक होना चाहिए ।



जैन धर्म के त्रिरत्न कौन - कौन से है ?


जैन धर्म के तीन रत्न , जिसे रत्नत्रय भी कहते हैं। इनको सम्यक दर्शन (सही दर्शन), सम्यक ज्ञान तथा सम्यक चरित्र के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनमें से किसी का भी अन्य दो के बिना अलग अस्तित्व नहीं हो सकता तथा आध्यात्मिक मुक्ति के लिए तीनों आवश्यक हैं।




जैन धर्म के त्रिरत्न – सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन, सम्यक आचरण।


1. सम्यक ज्ञान – सत्य तथा असत्य का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है।
( सम्यक ज्ञान को समझने के लिए जैन धर्म में ज्ञान के प्रकार वाला Article देखे । )


2. सम्यक दर्शन – यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा ही सम्यक दर्शन है।


3. सम्यक चरित्र (आचरण) – अहितकर कार्यों का निषेध तथा हितकारी कार्यों का आचरण ही सम्यक चरित्र है।


इस प्रकार सें सम्यक ज्ञान (Perfect knowledge) , सम्यक दर्शन (Right philosophy) एवं सम्यक चारित्र (Right Conduct) तीनो की पालना करने से हि धर्म सम्पूर्ण होता है ।


अगर कोई त्रुटी हो तो " तस्स मिच्छामी दुक्कडम "

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