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जैन धर्म में तीर्थंकर क्या होते हैं ?

जैन धर्म में तीर्थंकर अरिहंत भगवान होते हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है तीर्थ की स्थापना करने वाला ।
जैन धर्म में साधु , साध्वी, श्रावक, श्राविका ये चार तीर्थ की स्थापना करने के कारण तीर्थंकर कहलाते है । जब प्रभु कैवलय ज्ञान प्राप्त करते है तब वह सर्वज्ञ हो जाते है, वे अपने चार घनघाती कर्मो का क्षय कर अरिहंत कहलाते है ।
उसके पश्चात वह धर्म की स्थापना के लिए उपदेश देते है ।  प्रभु द्वारा प्रतिपादित धर्म में जो गृहत्याग कर कठोर धर्म के पालन का प्रण लेता है तो वह पुरूष साधु तथा महिला साध्वी कहलाती है । इसी प्रकार जो गृहस्थ धर्म में रहकर हि मध्यम प्रकार से धर्म का मार्ग चुनता है तो जिन का वह अनुयायी अगर पुरुष है तो श्रावक और स्त्री है तो श्राविका कहलाती है । इस प्रकार से तीर्थंकर महाप्रभु दो प्रकार के धर्म का प्रतिपादन करते है। 1. साधु धर्म 2. श्रावक धर्म इस प्रकार इन तीर्थ कि स्थापना करने के कारण वह तीर्थंकर कहलाते है । तीर्थ अर्थात्‌ स्वयं तरने में समर्थ । जब तीर्थंकर महाप्रभु अपने समस्त कर्मो का क्षय कर लेते है तो वह निवार्ण को प्राप्त होते है अर्थात् सिद्ध भगवान कहलाते है । उदाहरण - वर्…
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भगवान महावीर और चंड कौशिक

भगवान महावीर अंबिका नगरी कि तरफ बढ़े, वहा से मार्ग जंगल में दो रास्तो में बंट गया । किसी राहगीर ने प्रभु महावीर को बताया कि पहला रास्ता बड़ा है परंतु सुरक्षित है परंतु यह दूसरा मार्ग छोटा होने के साथ-साथ ही खतरनाक भी है इस मार्ग में चंड कौशिक नाम का भयंकर विषधर रहता है उसकी दृष्टि मात्र से ही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है भगवान महावीर मुस्कुराए और उस छोटे और मुश्किल रास्ते की तरफ बढ़ दिए। प्रभु महावीर रास्ते से जा रहे थे तभी भयंकर विषधर चंड कौशिक ने उनकी तरफ देखा।
चंड कौशिक ने अपना दृष्टि विष भगवान महावीर की तरफ डाला , परन्तु ये क्या ? विषधर के विष का कोई प्रभाव हि नही हुआ। चंड कौशिक ने अपने क्रोध के वश हो प्रभु के अंगुठे पर दंश किया । परंतु यह क्या आश्चर्य ! अंगूठे मे लाल रक्त की जगह दूध की धारा बह निकली। चंड कौशिक का सारा घमंड चूर चूर हो गया फिर भगवान महावीर ने सांत्वना भरी वाणी में कहा "शांत चंड कौशिक शांत , तुम्हारे क्रोध के कारण ही तुम अपने कर्मो का फल भुगत रहे हो, अपने पूर्व जन्मों मे भी तुमने क्रोध के कारण अपना जन्म गवा दिया था, अब इससे शांति और अहिंसा में लगाओ निरापराध प्र…

देव दर्शन स्तोत्र

दर्शनं देवदेवस्य, दर्शनं पापनाशनम्।

दर्शनं स्वर्गसोपानं, दर्शनं मोक्षसाधनम्॥ १॥

दर्शनेन जिनेन्द्राणां, साधूनां वन्दनेन च।

न तिष्ठति चिरं पापं, छिद्रहस्ते यथोदकम्॥ २॥

वीतराग – मुखं दृष्ट्वा, पद्मरागसमप्रभम्।

नैकजन्मकृतं पापं, दर्शनेन विनश्यति॥ ३॥

दर्शनं जिनसूर्यस्य, संसार-ध्वान्तनाशनम्।

बोधनं चित्तपद्मस्य, समस्तार्थ-प्रकाशनम्॥ ४॥

दर्शनं जिनचन्द्रस्य, सद्धर्मामृत-वर्षणम्।

जन्म-दाहविनाशाय, वर्धनं सुखवारिधे:॥ ५॥

जीवादितत्त्व प्रतिपादकाय, सम्यक्त्व मुख्याष्टगुणार्णवाय।

प्रशान्तरूपाय दिगम्बराय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय॥ ६॥

चिदानन्दैक – रूपाय, जिनाय परमात्मने।

परमात्मप्रकाशाय, नित्यं सिद्धात्मने नम:॥ ७॥

अन्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम।

तस्मात्कारुण्यभावेन, रक्ष रक्ष जिनेश्वर:॥ ८॥

न हि त्राता न हि त्राता, न हि त्राता जगत्त्रये।

वीतरागात्परो देवो, न भूतो न भविष्यति॥ ९॥

जिने भक्तिर्जिने भक्तिर्जिने भक्ति-र्दिनेदिने।

सदा मेऽस्तु सदा मेऽस्तु,सदा मेऽस्तु भवे भवे॥ १०॥

जिनधर्मविनिर्मुक्तो, मा भूवंचक्रवत्र्यपि।

स्यां चेटोऽपि दरिद्रोऽपि, जिनधर्मानुवासित:॥ ११॥

जन्मजन्मकृतं पापं, जन्मकोटिमुपार्जितम्।

जन…

Kalyan Mandir Stotra / कल्याणमन्दिरस्तोत्रम्

कल्याण-मन्दिरमुदारमवद्य-भेदि भीताभय-प्रदमनिन्दितमंग्-घ्रि-पद्मम्| संसार-सागर-निमज्जदशेष-जन्तु- पोतायमानभभिनम्य जिनेश्वरस्य|1|

यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशेः स्तोत्रं सुविस्त्रत-मतिर्न विभुर्विधातुम्| तीर्थेश्वरस्य कमठ-स्मय-धूमकेतो- स्तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये|2|

सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरुप- मस्मादृशः कथमधीश भवन्त्यधीशाः| धृष्टोऽपि कौशिक-शिशुर्यदि वा दिवान्धो रुपं प्ररुपयति किं किल धर्मरश्मेः |3|

मोह-क्षयादनुभवन्नपि नाथ मत्य्रो नूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत| कल्पान्त-वान्त-पयसः प्रकटोऽपि यस्मा- न्मीयेत केन जलधेर्ननु रत्नराशिः |4|

अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ जडाशयोऽपि कर्तुं स्तवं लसदसंख्य-गुणाकरस्य | बालोऽपि किं न निज-बाहु-युगं वितत्य विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशेः|5|

ये योगनामपि न यान्ति गुणास्तवेश वक्तुं कथं भवति तेषु ममावकाशः | जाता तदेवमसमीक्षित-कारितेयं जल्पन्ति वा निज-गिरा ननु पक्षिणोऽपि|6|

आस्तामचिन्त्य-महिमा जिन संस्तवस्ते नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति | तीव्रातपोपहत-पान्थ-जनान्निदाघे प्रीणाति पद्म-सरसः सरसोऽनिलोऽपि|7|

ह्रद्वर्तिनि त्वयि विभो शिथिलीभवन्ति जन्तोः …

भक्तामर स्तोत्र (हिंदी)

सुर-नत-मुकुट रतन-छवि करें,अंतर पाप-तिमिर सब हरें ।
जिनपद वंदूं मन वच काय, भव-जल-पतित उधरन-सहाय ।।१।।

श्रुत-पारग इंद्रादिक देव, जाकी थुति कीनी कर सेव |
शब्द मनोहर अरथ विशाल, तिन प्रभु की वरनूं गुन-माल ||२||

विबुध-वंद्य-पद मैं मति-हीन, हो निलज्ज थुति मनसा कीन |
जल-प्रतिबिंब बुद्ध को गहे, शशिमंडल बालक ही चहे ||३||

गुन-समुद्र तुम गुन अविकार, कहत न सुर-गुरु पावें पार |
प्रलय-पवन-उद्धत जल-जंतु, जलधि तिरे को भुज बलवंतु ||४||

सो मैं शक्ति-हीन थुति करूँ, भक्ति-भाव-वश कछु नहिं डरूँ |
ज्यों मृगि निज-सुत पालन हेत, मृगपति सन्मुख जाय अचेत |५||

मैं शठ सुधी-हँसन को धाम, मुझ तव भक्ति बुलावे राम |
ज्यों पिक अंब-कली परभाव, मधु-ऋतु मधुर करे आराव ||६||

तुम जस जंपत जन छिन माँहिं, जनम-जनम के पाप नशाहिं |
ज्यों रवि उगे फटे ततकाल, अलिवत् नील निशा-तम-जाल ||७||

तव प्रभाव तें कहूँ विचार, होसी यह थुति जन-मन-हार |
ज्यों जल कमल-पत्र पे परे, मुक्ताफल की द्युति विस्तरे ||८||

तुम गुन-महिमा-हत दु:ख-दोष, सो तो दूर रहो सुख-पोष |
पाप-विनाशक है तुम नाम, कमल-विकासी ज्यों रवि-धाम ||९||

नहिं अचंभ जो होहिं तुरंत, तुमसे तुम-गु…

भगवान अजितनाथ जी

भगवान अजितनाथ जैन धर्म के द्वितीय तीर्थंकर थे ।अजितनाथ प्रभु का जन्म अयोध्या के राजपरिवार में माघ के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन हुआ था। इनके पिता का नाम जितशत्रु राजा और माता का नाम विजया देवी था। तीर्थंकर अजितनाथ भगवान का प्रतिक चिह्न हाथी था।
जन्म प्रभु अजितनाथ जी का जन्म माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था , प्रभु का जन्मकल्याणक 64 इन्द्रो के द्वारा प्रभु का अभिषेक किया गया ।
दीक्षा उचित समय आने पर प्रभु ने दीक्षा ग्रहण की , प्रभु ने पंचमुष्ठी लोच कर दिगम्बर वेश धारण कर दीक्षा ग्रहण की और दीक्षा के समय मनः पर्व ज्ञान की प्राप्ती हुई । जिस दिन प्रभु ने दीक्षा ग्रहण की जैन आगमों के अनुसार उस दिन रोहिणी नक्षत्र था ।
साधना काल प्रभु अजितनाथ के साधनाकाल की अवधी 12 वर्ष थी । प्रभु ने इन 12 वर्षो में अपने समस्त कर्मो का नाश कर दिया , और 4 घनघाती कर्मो का क्षय कर अरिहंत कहलाये ।  प्रभु को दीक्षा के पश्चात् सर्वप्रथम दान बह्दत नामक राजा के द्वारा भिक्षा कि प्राप्ती हुई । इस प्रकार से बह्दत प्रथम दानदाता हुआ । 
धर्म कि स्थापना और कैव्लय ज्ञान की प्राप्ती प्रभु अपने 12 वर्ष के साधनाकाल के उपरा…

भगवान ऋषभदेव जी

भगवान ऋषभदेव जी इस कालक्रम में जैन धर्म के प्रवर्तक है । भगवान ऋषभदेव जी जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर है । भगवान ऋषभदेव जी को आदिनाथ भी कहा जाता है । इन्के पिता का नाम नाभिराज तथा माता का नाम मरूदेवी था । इनके पिता कुलकर व्यवस्था कें अतिंम 15 वें कुलकर थे । भगवान ऋषभदेव जी इस पृथ्वी के प्रथम राजा थे । वे प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे । इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" रखा गया था । भगवान ऋषभदेव ने असी, मसी और कृषी का निर्माण किया था । गणित और बाह्नी लिपी भी प्रभु आदिनाथ की देन है ।
प्रभु ऋषभदेव जी के 100 पुत्र तथा दो पुत्रियाँ ब्रह्मी तथा सुंदरी जी थी । भगवान ऋषभदेव जी बाहुबली जी के पिता थे , जिनकी प्रतिमा गोमतेश्वर नामक तीर्थ में स्थित है ।


जन्म भगवान ऋषभदेव जी का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था , जैन रामायण के अनुसार वह प्रभु श्री राम के पूर्वज थे । प्रभु ऋषभदेव भगवान की आयु 84 लाख पूर्व की थी ।
राजा के रूप में कार्य एक राजा के रूप में प्रभु ने इस पृथ्वी को असी, मसी, कृषी , व्यापार, गणित, ज्योतिष, अंक विद्या, चक्रवर्ती भरत को 72 कलाएं तथा बाह्नी जी को 64 कलाएँ सिखा…

श्री पार्श्वनाथ जी स्तोत्र

यह स्तोत्र जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का है । यह स्तोत्र महान चमत्कारी और कल्याणकारी है । इस स्तोत्र में विभिन्न उपमाओं द्वारा प्रभु की स्तुती कि है । कविश्री द्यानतराय
नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्रं अधीशं, शतेन्द्रं सु पूजें भजें नाय-शीशं | मुनीन्द्रं गणीन्द्रं नमें जोड़ि हाथं, नमो देव-देवं सदा पार्श्वनाथं ||१||
गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुड़ावे, महा-आग तें, नाग तें तू बचावे | महावीर तें युद्ध में तू जितावे, महा-रोग तें, बंध तें तू छुड़ावे ||२||
दु:खी-दु:ख-हर्ता, सुखी-सुक्ख-कर्ता, सदा सेवकों को महानंद-भर्ता | हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं, विषम डाकिनी विघ्न के भय अवाचं ||३||
दरिद्रीन को द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने | महासंकटों से निकारे विधाता, सबे संपदा सर्व को देहि दाता ||४||
महाचोर को, वज्र को भय निवारे, महापौन के पुंज तें तू उबारे | महाक्रोध की अग्नि को मेघधारा, महालोभ-शैलेश को वज्र मारा ||५||
महामोह-अंधेर को ज्ञान-भानं, महा-कर्म-कांतार को द्यौ प्रधानं | किये नाग-नागिन अधोलोक-स्वामी, हर्यो मान तू दैत्य को हो अकामी ||६||
तुही कल्पवृक्षं …