बड़ी साधु वंदना

बड़ी साधु वंदना जैन मुनि जयमल जी महाराज द्वारा लिखी गई थी,बड़ी साधु वंदना को जैन आगमों का सार भी कहते हैं, इस एक पाठ को पढ़ लेने से 32 आगमों कि वाचना हो जाती है । प्रत्येक श्रावक - श्राविका को सामायिक के दौरान बड़ी साधु वंदना का पाठ अवश्य करना चाहिए।


            बड़ी साधु वंदना

नमूं अनंत चैबीसी, ऋषभादिक महावीर ।

इण आर्य क्षेत्र मां, घाली धर्म नी सीर ।।1।।


महाअतुल-बली नर, शूर-वीर ने धीर ।

तीरथ प्रवर्तावी, पहुंचा भव-जल-तीर ।।2।।


सीमंधर प्रमुख, जघन्य तीर्थंकर बीस ।

छै अढ़ी द्वीप मां, जयवंता जगदीश ।।3।।


एक सौ ने सत्तर, उत्कृष्ट पदे जगीश ।

धन्य मोटा प्रभुजी, तेह ने नमाऊँ शीश ।।4।।


केवली दोय कोड़ी, उत्कृष्टा नव कोड़ ।

मुनि दोय सहस कोड़ी, उत्कृष्टा नव सहस कोड़ ।।5।।


विचरे छै विदेहे, मोटा तपसी घोर ।

भावे करि वंदूं, टाले भव नी खोड़ ।।6।।


चैबीसे जिन ना, सगला ही गणधार ।

चैदह सौ ने बावन, ते प्रणमूँ सुखकार ।।7।।


जिनशासन-नायक, धन्य श्री वीर जिनंद ।

गौतमादिक गणधर, वर्तायो आनंद ।।8।।


श्री ऋषभदेव ना, भरतादिक सौ पूत ।

वैराग्य मन आणी, संयम लियो अद्भूत ।।9।।


केवल उपजाव्यूं, कर करणी करतूत ।

जिनमत दीपावी, सगला मोक्ष पहूंत ।।10।।


श्री भरतेश्वर ना, हुआ पटोधर आठ ।

आदित्यजशादिक, पहुंत्या शिवपुर-वाट ।।11।।


श्री जिन-अंतर ना, हुआ पाट असंख ।

मुनि मुक्ति पहुंत्या, टालि कर्म नो वंक ।।12।।


धन्य कपिल मुनिवर, नमी नमूं अणगार ।

जेणे तत्क्षण त्याग्यो, सहस-रमणी-परिवार ।।13।।


मुनि बल हरिकेशी, चित्त मुनीश्वर सार ।

शुद्ध संयम पाली, पाम्या भव नो पार ।।14।।


वलि इखुकार राजा, घर कमलावती नार ।

भग्गू ने जशा, तेहना दोय कुमार ।।15।।


छये छती ऋद्ध छांडी, लीधो संयम-भार ।

इण अल्पकाल मां, पाम्या मोक्ष-द्वार ।।16।।


वलि संयति राजा, हिरण-आहिडे जाय ।

मुनिवर गर्दभाली, आण्यो मारग ठाय ।।17।।


चारित्र लेई ने, भेट्या गुरु ना पाय ।

क्षत्री राज ऋषीश्वर, चर्चा करी चित लाय ।।18।।


वलि दशे चक्रवर्ती, राज्य-रमणी ऋद्धि छोड़ ।

दशे मुक्ति पहुंत्या, कुल ने शोभा च्होड़ ।।19।।


इस अवसर्पिणी काल मां, आठ राम गया मोक्ष ।

बलभद्र मुनीश्वर, गया पंचमे देवलोक ।।20।।


दशार्णभद्र राजा, वीर वांद्या धरि मान ।

पछि इंद्र हटायो, दियो छः काय-अभयदान ।।21।।


करकंडू प्रमुख, चारे प्रत्येक बुद्ध ।

मुनि मुक्ति पहुंत्या, जीत्या कर्म महाजुद्ध ।।22।।


धन्य मोटा मुनिवर, मृगापुत्र जगीश ।

मुनिवर अनाथी, जीत्या राग ने रीश ।।23।।


वलि समुद्रपाल मुनि, राजमती रहनेम ।

केशी ने गौतम, पाम्या शिवपुर-खेम ।।24।।


धन विजयघोष मुनि, जयघोष वलि जाण ।

श्री गर्गाचार्य, पहुंत्या छै निर्वाण ।।25।।


श्री उत्तराध्ययन मां, जिनवर कर्या बखाण ।

शुद्ध मन से ध्यावो, मन में धीरज आण ।।26।।


वलि खंदक संन्यासी, राख्यो गौतम-स्नेह ।

महावीर समीपे, पंच महाव्रत लेह ।।27।।


तप कठिन करीने, झौंसी आपणी देह ।

गया अच्युत देवलोके, चवि लेसे भव-छेह ।।28।।


वलि ऋषभदत्त मुनि, सेठ सुदर्शन सार ।

शिवराज ऋषीश्वर, धन्य गांगेय अणगार ।।29।।


शुद्ध संयम पाली, पाम्या केवल सार ।

ये चारे मुनिवर, पहुंच्या मोक्ष मंझार ।।30।।


भगवंत नी माता, धन-धन सती देवानंदा ।

वलि सती जयंती, छोड़ दिया घर-फंदा ।।31।।


सति मुक्ति पहुंत्या, वलि ते वीर नी नंद ।

महासती सुदर्शना, घणी सतियों ना वृंद ।।32।।


वलि कार्तिक सेठे, पडि़मा वही शूर-वीर ।

जीम्यो मोरां ऊपर, तापस बलती खीर ।।33।।


पछी चारित्र लीधो, मित्र एक सहस आठ धीर ।

मरी हुओ शक्रेन्द्र, चवि लेसे भव-तीर ।।34।।


वलि राय उदायन, दियो भाणेज ने राज ।

पछी चारित्र लेईने, सार्या आतम-काज ।।35।।


गंगदत्त मुनि आनंद, तारण-तरण जहाज ।

मुनि कौशल रोहो, दियो घणां ने साज ।।36।।


धन्य सुनक्षत्र मुनिवर, सर्वानुभूति अणगार ।

आराधक हुई ने, गया देवलोक मझार ।।37।।


चवि मुक्ति जासे, वलि सिंह मुनीश्वर सार ।

बीजा पण मुनिवर, भगवती मां अधिकार ।।38।।


श्रेणिक नो बेटो, मोटो मुनिवर मेघ ।

तजी आठ अंतेउरी, आण्यो मन संवेग ।।39।।


वीर पै व्रत लेई ने, बांधी तप नी तेग ।

गया विजय विमाने, चवि लेसे शिव-वेग ।।40।।


धन्य थावच्चा पुत्र, तजी बतीसो नार ।

तेनी साथे निकल्या, पुरुष एक हजार ।।41।।


शुकदेव संन्यासी, एक सहस शिष्य लार ।

पांच-सौ से शेलक, लीधो संयम-भार ।।42।।


सब सहस अढ़ाई, घणा जीवों ने तार ।

पुंडरिकगिरि ऊपर, कियो पादोपगमन संथार ।।43।।


आराधक हुई ने, कीधो खेवो पार ।

हुआ मोटा मुनिवर, नाम लियां निस्तार ।।44।।


धन्य जिनपाल मुनिवर, दोय धन्ना हुआ साध ।

गया प्रथम देवलोके, मोक्ष जासे आराध ।।45।।


श्री मल्लीनाथ ना छह मित्र, महाबल प्रमुख मुनिराय ।

सर्वे मुक्ति सिधाव्या, मोटी पदवी पाय ।।46।।


वलि जितशत्रु राजा, सुबुद्धि नामे प्रधान ।

पोते चारित्र लई ने, पाम्या मोक्ष-निधान ।।47।।


धन्य तेतली मुनिवर, दियो छ काय अभयदान ।

पोटिला प्रतिबोध्या, पाम्या केवलज्ञान ।।48।।


धन्य पांचे पांडव, तजी द्रौपदी नार ।

थेवरां नी पासे, लीधो संयम-भार ।।49।।


श्री नेमि वंदन नो, एहवो अभिग्रह कीध ।

मास-मासखमण तप, शत्रुंजय जई सिद्ध ।।50।।


धर्मघोष तणा शिष्य, धर्मरुचि अणगार ।

कीडि़यों नी करुणा, आणी दया अपार ।।51।।


कड़वा तूँबा नो, कीधो सगलो आहार ।

सर्वार्थसिद्ध पहुंत्या, चवि लेसे भव-पार ।।52।।


वलि पुंडरिक राजा, कुंडरिक डिगियो जाण ।

पोते चारित्र लेई ने, न घाली धर्म मां हाण ।।53।।


सर्वार्थसिद्ध पहुंत्या, चवि लेसे निर्वाण ।

श्री ज्ञातासूत्र मां, जिनवर कर्या बखाण ।।54।।


गौतमादिक कुंवर, सगा अठारे भ्रात ।

सब अंधकविष्णु-सुत, धारिणी ज्यांरी मात ।।55।।


तजी आठ अंतेउर, काढ़ी दीक्षा नी बात ।

चारित्र लेई ने, कीधो मुक्ति नो साथ ।।56।।


श्री अनीकसेनादिक, छहे सहोदर भाय ।

वसुदेव ना नंदन, देवकी ज्यांरी माय ।।57।।


भद्दिलपुर नगरी, नाग गाहावई जाण ।

सुलसा-घर वधिया, सांभली नेम नी वाण ।।58।।


तजी बत्तीस-बत्तीस अंतेउर, निकलिया छिटकाय ।

नल कूबेर समाना, भेट्या श्री नेमि ना पाय ।।59।।


करी छठ-छठ पारणा, मन में वैराग्य लाय ।

एक मास संथारे, मुक्ति विराज्या जाय ।।60।।


वलि दारुक सारण, सुमुख-दुमुख मुनिराय ।

वलि कुंवर अनाधृष्ट, गया मुक्ति-गढ़ मांय ।।61।।


वसुदेव ना नंदन, धन-धन गजसुकुमाल ।

रूपे अति सुंदर, कलावन्त वय बाल ।।62।।


श्री नेमी समीपे, छोड्यो मोह-जंजाल ।

भिक्षु नी पडि़मा, गया मसाण महाकाल ।।63।।


देखी सोमिल कोप्यो, मस्तक बांधी पाल ।

खेरा नां खीरा, शिर ठविया असराल ।।64।।


मुनि नजर न खंडी, मेटी मन नी झाल ।

परीषह सही ने, मुक्ति गया तत्काल ।।65।।


धन जाली मयाली, उवयाली आदि साध ।

शांब ने प्रद्युम्न, अनिरुध साधु अगाध ।।66।।


वलि सतनेमि, दृढ़नेमि, करणी कीधी निर्बाध ।

दशे मुक्ति पहुंत्या, जिनवर-वचन आराध ।।67।।


धन अर्जुनमाली, कियो कदाग्रह दूर ।

वीर पै व्रत लई ने, सत्यवादी हुआ शूर ।।68।।


करी छठ-छठ पारणा, क्षमा करी भरपूर ।

छह मासां मांही, कर्म किया चकचूर ।।69।।


कुँवर अइमुत्ते, दीठा गौतम स्वाम ।

सुणि वीर नी वाणी, कीधो उत्तम काम ।।70।।


चारित्र लेई ने, पहुंत्या शिवपुर-ठाम ।

धुर आदि मकाई, अन्त अलक्ष मुनि नाम ।।71।।


वलि कृष्णराय नी, अग्रमहिषी आठ ।

पुत्र-बहु दोय, संच्या पुण्य ना ठाठ ।।72।।


जादव-कुल सतियां, टाल्यो दुःख उचाट ।

पहुंची शिवपुर मां, ए छे सूत्र नो पाठ ।।73।।


श्रेणिक नी राणी, काली आदिक दश जाण ।

दशे पुत्र-वियोगे, सांभली वीर नी वाण ।।74।।


चंदनबाला पै, संयम लेई हुई जाण ।

तप कर देह झौंसी, पहुंची छै निर्वाण ।।75।।


नंदादिक तेरह, श्रेणिक नृप नी नार ।

सगली चंदनबाला पै, लीधो संयम-भार ।।76।।


एक मास संथारे, पहुंची मुक्ति मंझार ।

ए नेवुं जणा नो, अंतगड मां अधिकार ।।77।।


श्रेणिक ना बेटा, जाली आदिक तेवीस ।

वीर पै व्रत लेई ने, पाल्यो विसवावीस ।।78।।


तप कठिन करी ने, पूरी मन जगीश ।

देवलोके पहुंत्या, मोक्ष जासे तजी रीश ।।79।।


काकन्दी नो धन्नो, तजी बत्तीसे नार ।

महावीर समीपे, लीधो संयम भार ।।80।।


करी छठ-छठ पारणा, आयंबिल उज्झित आहार ।

श्री वीर बखाण्यो, धन धन्नो अणगार ।।81।।


एक मास संथारे, सर्वार्थसिद्ध पहुंत ।

महाविदेह क्षेत्र मां, करसे भवनो अंत ।।82।।


धन्ना नी रीते, हुआ नव ही संत ।

श्री अनुत्तरोववाई मां, भाखि गया भगवंत ।।83।।


सुबाहु प्रमुख, पांच-पांच सौ नार ।

तजी वीर पे लीधा, पांच महाव्रत सार ।।84।।


चारित्र लेई ने, पाल्यो निर् अतिचार ।

देवलोक पहुंच्या, सुखविपाके अधिकार ।।85।।


श्रेणिक ना पोता, पउमादिक हुआ दस ।

वीर पै व्रत लेई ने, काढ़्यो देह नो कस ।।86।।


संयम आराधी, देवलोक मां जई बस ।

महाविदेह क्षेत्र मां, मोक्ष जासे लेई जस ।।87।।


बलभद्र ना नन्दन, निषधादिक हुआ बार ।

तजी पचास अंतेउरी, त्याग दियो संसार ।।88।।


सहु नेमि समीपे, चार महाव्रत लीध ।

सर्वार्थसिद्ध पहुंच्या, होसे विदेहे सिद्ध ।।89।।


धन्ना ने शालिभद्र, मुनीश्वरों नी जोड़ ।

नारी ना बंधन, तत्क्षण नांख्या तोड़ ।।90।।


घर-कुटुम्ब-कबीलो, धन-कंचन नी कोड़ ।

मास-मासखमण तप, टालसे भव नी खोड़ ।।91।।


श्री सुधर्मा ना शिष्य, धन-धन जंबू स्वाम ।

तजी आठ अंतेउरी, मात-पिता धन-धाम ।।92।।


प्रभवादिक तारी, पहुंत्या शिवपुर-ठाम ।

सूत्र प्रवर्तावी, जग मां राख्यूं नाम ।।93।।


धन ढंढण मुनिवर, कृष्णराय ना नंद ।

शुद्ध अभिग्रह पाली, टाल दियो भव-फंद ।।94।।


वलि खंदक ऋषि नी, देह उतारी खाल ।

परीषह सही ने, भव-फेरा दिया टाल ।।95।।


वलि खंदक ऋषि ना, हुआ पांचसौ शीश ।

घाणी मां पील्या, मुक्ति गया तज रीश ।।96।।


संभूतिविजय-शिष्य, भद्रबाहु मुनिराय ।

चैदह पूर्वधारी, चंद्रगुप्त आण्यो ठाय ।।97।।


वलि आद्र्रकुंवर मुनि, स्थूलभद्र नंदिषेण ।

अरणक अइमुत्तो, मुनीश्वरों नी श्रेण ।।98।।


चैबीसे जिन ना मुनिवर, संख्या अठावीश लाख ।

ऊपर सहस अड़तालीस, सूत्र परंपरा भाख ।।99।।


कोई उत्तम वांचो, मोंढे जयणा राख ।

उघाड़े मुख बोल्यां, पाप लगे इम भाख ।।100।।


धन्य मरुदेवी माता, ध्यायो निर्मल ध्यान ।

गज-होदे पायो, निर्मल केवल ज्ञान ।।101।।


धन आदीश्वर नी पुत्री, ब्राह्मी सुन्दरी दोय ।

चारित्र लेई ने, मुक्ति गई सिद्ध होय ।।102।।


चैबीसे जिन नी, बड़ी शिष्यणी चैबीस ।

सती मुक्ति पहुंच्या, पूरी मन जगीश ।।103।।


चैबीसे जिन ना, सर्व साधवी सार ।

अड़तालीस लाख ने, आठ से सत्तर हजार ।।104।।


चेड़ा नी पुत्री, राखी धर्म नी प्रीत ।

राजीमती विजया, मृगावती सुविनीत ।।105।।


पद्मावती मयणरेहा, द्रौपदी दमयंती सीत ।

इत्यादिक सतियां, गई जमारो जीत ।।106।।


चैबीसे जिन नां, साधु-साधवी सार ।

गया मोक्ष देवलोके, हृदय राखो धार ।।107।।


इण अढ़ी द्वीप मां, घरड़ा तपसी बाल ।

शुद्ध पंच महाव्रत धारी, नमो-नमो तिहुं काल ।।108।।


इण यतियों सतियों ना, लीजे नित प्रति नाम ।

शुद्ध मन थी ध्यावो, एह तिरण नो ठाम ।।109।।


इण यतियों सतियों सूं, राखो उज्ज्वल भाव ।

इम कहे ऋषि ‘जयमल’ एह तिरण नो दाव ।।110।।


संवत् अठारा ने, वर्ष साते सिरदार ।

गढ़ जालोर मांही, एह कह्यो अधिकार ।।111।।

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