सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पोस्ट

फ़रवरी, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Featured Post

जैन धर्म में तीर्थंकर क्या होते हैं ?

जैन धर्म में तीर्थंकर अरिहंत भगवान होते हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है तीर्थ की स्थापना करने वाला ।
जैन धर्म में साधु , साध्वी, श्रावक, श्राविका ये चार तीर्थ की स्थापना करने के कारण तीर्थंकर कहलाते है । जब प्रभु कैवलय ज्ञान प्राप्त करते है तब वह सर्वज्ञ हो जाते है, वे अपने चार घनघाती कर्मो का क्षय कर अरिहंत कहलाते है ।
उसके पश्चात वह धर्म की स्थापना के लिए उपदेश देते है ।  प्रभु द्वारा प्रतिपादित धर्म में जो गृहत्याग कर कठोर धर्म के पालन का प्रण लेता है तो वह पुरूष साधु तथा महिला साध्वी कहलाती है । इसी प्रकार जो गृहस्थ धर्म में रहकर हि मध्यम प्रकार से धर्म का मार्ग चुनता है तो जिन का वह अनुयायी अगर पुरुष है तो श्रावक और स्त्री है तो श्राविका कहलाती है । इस प्रकार से तीर्थंकर महाप्रभु दो प्रकार के धर्म का प्रतिपादन करते है। 1. साधु धर्म 2. श्रावक धर्म इस प्रकार इन तीर्थ कि स्थापना करने के कारण वह तीर्थंकर कहलाते है । तीर्थ अर्थात्‌ स्वयं तरने में समर्थ । जब तीर्थंकर महाप्रभु अपने समस्त कर्मो का क्षय कर लेते है तो वह निवार्ण को प्राप्त होते है अर्थात् सिद्ध भगवान कहलाते है । उदाहरण - वर्…

बारह भावना

जैन धर्म में भावना का विशेष महत्व हैं, जैन धर्म भावना प्रधान धर्म है। जैन धर्म में 12 प्रकार कि भावना का वर्णन हैं जो आत्मा को धर्म का दर्शन कराती है।
1. अनित्य भावना

राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार,
मरना सबको एक दिन, अपनी अपनी बार !

2. अशरण भावना

दल बल देवी देवता, मात पिता परिवार ,
मरती बिरियाँ जीव को, कोई न राखनहार!!

3. संसार भावना

दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णावश धनवान,
कहूं न सुख संसार में, सब जग देख्यो छान !

4. एकत्व भावना

आप अकेला अवतरे, मरै अकेलो होय ,
घर संपत्ति पर प्रगट ये, साथी सगा न कोय !

5. अन्यत्व भावना

जहाँ देह अपनी नहीं, तहाँ न अपनों कोय ,
घर संपत्ति पर प्रगट ये, तहाँ न अपनों कोय !

6. अशुचि भावना

दिपै चाम -चादर मढ़ी, हाड पींजरा देह ,
भीतर या सम जगत में, अवर नहीं घिन -गेह !

7. आश्रव भावना

मोह नींद के जोर, जगवासी घूमैंसदा ,
कर्म -चोर चहुँ ओर, सरवस लूटें सुध नहीं !

8. संवर भावना

सतगुरु देय जगाय, मोह नींद जब उपशमें,
तब कछु बनहिं उपाय, कर्मचार आवत रुकें !

9. निर्जरा भावना

ज्ञान दीप तप-तेल भर, घर शोधे भृम छोर ,
या विधि बिन निकसै नहीं, पैठे पूरब चोर

10. लोक भावना

पंच महाव्रत संचरण, समित…

गुरु वंदना का पाठ

जब कभी भी जैन श्रावक जैन साधु-साध्वी जी को देखतें है तो तिक्‍खुत्तो के पाठ द्वारा साधु माहाराज कि वंदना कि जाती है, चाहे साधु जी कही पर भी दिख जायें वही सें जैन श्रावक अपना नमस्कार कर देतें है।
  गुरु वंदना का पाठ। तिक्‍खुत्तो, आयाहिणं-पयाहिणं करेमि। वंदामि-नमंसामि।
सक्‍कारेमि-सम्‍माणेमि, कल्‍लाणं- मंगलं, देवयं-चेइयं,पज्‍जुवासामि। मत्‍थएण वंदामि ।

लघु साधु वंदना

जैन धर्म में साधु जी को वंदना करना उत्तम माना जाता है, जैन शास्त्रो में साधु वंदना का विशेष महत्व बताया गया है, प्रत्येक श्रावक - श्राविका को यथाशक्ति साधु- साध्वी के दर्शन अवश्य करने चाहिए यह परम सौभाग्य कि बात है, अगर आप दर्शन न भी कर पाउो तो सामायिक में बड़ी साधु वदंना व लघु साधु वंदना का पाठ अवश्य करें।

लघु साधु वंदना
साधुजीने वंदना नित नित कीजे, प्रह उगमतेसुर रे प्राणी


नीच गतिमां ते नहीं जावे, पामे रिद्धि भरपूर रे प्राणी  (१)


मोटा ते पंच महाव्रत पाळे,छकायना प्रतिपाल रे प्राणी


भ्रमर भिक्षा मुनि सूझती लेवे, दोष बेतालीस टाळ रे प्राणी  (२)


रिद्धि संपदा मुनि कारमी जाणे, दीधी संसारने पूंठ रे प्राणी


एरे पुरुषनी बंदगी करतां, आठे करम जाय तूट रे प्राणी  (३)


एक एक मुनिवर रसना त्यागी, एक एक ज्ञान भंडार  रे प्राणी


एक एक मुनिवर वैयावच्च वैरागी, एना गुणनो नावे पार रे प्राणी  (४)


गुण सत्तावीस करीने दीपे, जीत्या परिषह बावीस रे प्राणी


बावन तो अनाचार ज टाळे, तेने नमावुं मारुं शीश रे प्राणी  (५)


जहाज समान ते संत मुनीश्वर, भव्य जीव बेसे आय रे प्राणी


पर उपकारी मुनि दाम न मांगे, देवे ते मुक्ति पहोंच्या…

जैन धर्म के शासन देव (24 यक्ष)

जैन धर्म में प्रत्येक तीर्थंकर के समय एक देवी व एक देवता विद्यमान होता है, जो शासन देवी व शासन देव कहलाते है।
जैन धर्म के 24 शासन देवों के नाम -: 1. गोमुख देव

2.महायक्ष देव

3. त्रिमुख देव

4. यक्षेश्वर देव

5. तुम्बरू देव

6. कुसुमदेव

7. वरनन्दि देव

8. विजय देव

9. अजित देव

10. ब्रह्मेश्वर देव

11. कुमार देव

12. षणमुखदेव

13.पाताल देव

14. किन्नर देव

15 किंपुरुष देव

16. गरुड़ देव

17. गंधर्व देव

18. महेंद्र देव

19. कुबेर देव

20. वरुण देव

21. विधुत्प्रभ देव

22. सर्वाण्हदेव

23. धरणेन्द्र देव

24. मातंग देव

जिस क्रम में जैन तीर्थंकर होते है, उसी क्रम में शासन देवो के नाम लिखें गयें हैं।

जैन धर्म में देवियाँ

जैन धर्म में देवियों कि भी पूजा कि जाती है, प्रत्येक तीर्थंकर भगवान के साथ एक शासन देव और एक देवी होती है, जो प्रभु की सेवा में निरंतर रहते है । इन्हे यक्ष व यक्षीणी कहते है । इनमें धर्म का असीम बल होता है तथा ये देवी-देवता अत्यंत शक्तिशाली होते है ।
जैन धर्म कि 24 देवियो के नाम-:
1. चक्रेश्वरी देवी

2. रोहिणी देवी

3. प्रज्ञप्तिदेवी

4. व्रजश्रृंखला देवी

5. पुरुषदत्ता देवी

6. मनोवेगा देवी

7. काली देवी

8. ज्वालामालिनी देवी

9. महाकाली देवी

10. मानवी देवी

11. गौरी देवी

12. गांधारी देवी

13. वैरोटी देवी

14. अनंतमती देवी

15. मानसी देवी

16. महामानसी देवी

17. जया देवी

18. तारावती

19. अपराजिता देवी

20. बहुरूपिणी देवी

21. चामुण्डा देवी

22. कुषमाण्डी देवी

23. पद्मावती देवी

24. सिद्धायनी देवी

जिस क्रम में तीर्थंकर भगवान है, उसी क्रम में यह देविंयो के नाम है।