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जैन धर्म में तीर्थंकर क्या होते हैं ?

जैन धर्म में तीर्थंकर अरिहंत भगवान होते हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है तीर्थ की स्थापना करने वाला ।
जैन धर्म में साधु , साध्वी, श्रावक, श्राविका ये चार तीर्थ की स्थापना करने के कारण तीर्थंकर कहलाते है । जब प्रभु कैवलय ज्ञान प्राप्त करते है तब वह सर्वज्ञ हो जाते है, वे अपने चार घनघाती कर्मो का क्षय कर अरिहंत कहलाते है ।
उसके पश्चात वह धर्म की स्थापना के लिए उपदेश देते है ।  प्रभु द्वारा प्रतिपादित धर्म में जो गृहत्याग कर कठोर धर्म के पालन का प्रण लेता है तो वह पुरूष साधु तथा महिला साध्वी कहलाती है । इसी प्रकार जो गृहस्थ धर्म में रहकर हि मध्यम प्रकार से धर्म का मार्ग चुनता है तो जिन का वह अनुयायी अगर पुरुष है तो श्रावक और स्त्री है तो श्राविका कहलाती है । इस प्रकार से तीर्थंकर महाप्रभु दो प्रकार के धर्म का प्रतिपादन करते है। 1. साधु धर्म 2. श्रावक धर्म इस प्रकार इन तीर्थ कि स्थापना करने के कारण वह तीर्थंकर कहलाते है । तीर्थ अर्थात्‌ स्वयं तरने में समर्थ । जब तीर्थंकर महाप्रभु अपने समस्त कर्मो का क्षय कर लेते है तो वह निवार्ण को प्राप्त होते है अर्थात् सिद्ध भगवान कहलाते है । उदाहरण - वर्…

जैन धर्म में वर्णित 18 पाप

पाप किसे कहते हैं ?


इस पर भगवान महावीर फरमाते हैं, "जो आत्मा को मलिन करें तथा जो बांधते सुखकारी ,भोगते दुखकारी, अशुभ योग से बंधे, सुख पूर्वक बांधा जाए, दुख पूर्वक भोगा जाए । पाप अशुभ प्रकृति रूप है, जिसका फल कड़वा, और जो प्राणी को मैला करें उसे पाप कहते हैं" ।

जैन धर्मानुसार पाप 18 प्रकार से बांधा जाता है और 82 प्रकार से भोगा जाता है ।

भगवती सूत्र प्रथम शतक कें नवें उद्देश्य में भगवान ने फरमाया है कि "इन 18 पाप स्थानो का सेवन करने से जीव भारी होता है और नीच गति में जाता है । इनका त्याग करने से जीव हल्का होता है और उर्ध्व गति प्राप्त करता है , 82 प्रकार से पाप के अशुभ फल भोग जाते हैं, इन पापों को जानकर पाप के कारणों को छोड़ने से जीव इस भव और परभव में निराबाध परम सुख प्राप्त करता है।"

जैन धर्म में पाप का वर्णन क्यों किया गया ?
इसलिए क्योंकि जीव इन पापों की पहचान कर उससे मुक्ति का प्रयास करें ।
जैन धर्म में वर्णित 18 पाप

जैन धर्म में 18 पाप के प्रकार निम्नलिखित हैं ।

1.प्रणातिपात- किसी भी जीव की हिंसा करना ,उसका वध कर देना, उसे जान से मार देना यह सबसे बड़ा पाप है ।

2. मृषावाद- असत्य वचन बोलना ,हमेशा झूठ बोलना यह सबसे बड़ा पाप है ।

3. अदत्तादान- किसी से पूछे बिना उसकी वस्तु लेना, चोरी करना यह पाप है ।

4. मैथुन - असंयमित होकर कुशील का सेवन करना पाप है।

5. परिग्रह - किसी वस्तु को संचित करना, द्रव्य आदि रखना ममता रखना पाप है।

आप कहेंगे क्यों ?
क्योंकि जो वस्तु हमारी आत्मा में कलेश उत्पन्न करें और उसके मूल स्वरूप में परिवर्तन लाए जिससे आत्मा अपनी पहचान खो जाती है ,वह पाप है।

6.क्रोध - खुद तपना ,दूसरों को तड़पाना, अत्यधिक क्रोध करना पाप है क्रोध सभी प्रकार की हानियों की जड़ है और यह पाप का मूल है।

7. मान- अंहकार (घमंड करना) पाप है ।

8. माया- ठगाई करना, कपट पूर्वक आचरण करना ।

9. लोभ - तृष्णा बढ़ना,अत्यधिक पाने की लालसा करना ।

10.राग- मनोज्ञ वस्तु पर स्नेह रखना, प्रीति करना । 

11.द्वेष- अमनोज्ञ वस्तु पर द्वेष करना ।

12. कलह - क्लेश करना ।

13. अभ्याख्यान - किसी पर झूठा कलंक लगाना ।

14. पैशुन्य- दूसरों की चुगली करना ।

15. परपरिवाद- दूसरों का अवर्णवाद (निन्दा) बोलना ।

16.रति अरति- पांच इंद्रियों के 23 विषयों में से मनोज्ञ वस्तु पर प्रसन्न होना, अमनोज्ञ वस्तु पर नाराज होना ।

17.मायामृषावाद- कपट सहित झूठ बोलना ।

18.मिथ्यादर्शन - असाधु को साधु समझना, कुदेव, कुगुरु कुधर्म पर श्रद्धा रखना ।

इस प्रकार उपरोक्त वर्णित 18 पापों को छोड़ देने से ही जीव की मुक्ति संभव होती है । इसलिए प्रत्येक जैन मुनि और जैन श्रावक छोटे से छोटे जीव की हिंसा के बारे में भी विचार करता है। 


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बड़ी साधु वंदना जैन मुनि जयमल जी महाराज द्वारा लिखी गई थी,बड़ी साधु वंदना को जैन आगमों का सार भी कहते हैं, इस एक पाठ को पढ़ लेने से 32 आगमों कि वाचना हो जाती है । प्रत्येक श्रावक - श्राविका को सामायिक के दौरान बड़ी साधु वंदना का पाठ अवश्य करना चाहिए।


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नमूं अनंत चैबीसी, ऋषभादिक महावीर ।

इण आर्य क्षेत्र मां, घाली धर्म नी सीर ।।1।।


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तीरथ प्रवर्तावी, पहुंचा भव-जल-तीर ।।2।।


सीमंधर प्रमुख, जघन्य तीर्थंकर बीस ।

छै अढ़ी द्वीप मां, जयवंता जगदीश ।।3।।


एक सौ ने सत्तर, उत्कृष्ट पदे जगीश ।

धन्य मोटा प्रभुजी, तेह ने नमाऊँ शीश ।।4।।


केवली दोय कोड़ी, उत्कृष्टा नव कोड़ ।

मुनि दोय सहस कोड़ी, उत्कृष्टा नव सहस कोड़ ।।5।।


विचरे छै विदेहे, मोटा तपसी घोर ।

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चैबीसे जिन ना, सगला ही गणधार ।

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णमो अरिहंताणं
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णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं
एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो
मंगला णं च सव्वेसिं, पढमं हवई मंगलं

नवकार मंत्र का अर्थ क्या है ?
1. णमो अरिहंताणं - अरिहंतो को नमस्कार हो।
2.णमो सिद्धाणं - सिद्धो को नमस्कार हो ।
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4.णमो उवज्झायाणं - उपाध्यायो को नमस्कार हो ।
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