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जैन धर्म में वर्णित 18 पाप

जैन धर्मानुसार पाप 18 प्रकार से बांधा जाता है,भगवान ने फरमाया है कि इन 18 पाप स्थानो का सेवन करने से जीव भारी होता है और नीच गति में जाता है,जैन धर्म

जैन धर्म में वर्णित 18 पाप 

पाप किसे कहते हैं ?

इस पर भगवान महावीर फरमाते हैं, "जो आत्मा को मलिन करें तथा जो बांधते सुखकारी ,भोगते दुखकारी, अशुभ योग से बंधे, सुख पूर्वक बांधा जाए, दुख पूर्वक भोगा जाए । पाप अशुभ प्रकृति रूप है, जिसका फल कड़वा, और जो प्राणी को मैला करें उसे पाप कहते हैं" ।

जैन धर्मानुसार पाप 18 प्रकार से बांधा जाता है और 82 प्रकार से भोगा जाता है ।

भगवती सूत्र प्रथम शतक कें नवें उद्देश्य में भगवान ने फरमाया है कि "इन 18 पाप स्थानो का सेवन करने से जीव भारी होता है और नीच गति में जाता है । इनका त्याग करने से जीव हल्का होता है और उर्ध्व गति प्राप्त करता है , 82 प्रकार से पाप के अशुभ फल भोग जाते हैं, इन पापों को जानकर पाप के कारणों को छोड़ने से जीव इस भव और परभव में निराबाध परम सुख प्राप्त करता है।"

जैन धर्म में पाप का वर्णन क्यों किया गया ?

इसलिए क्योंकि जीव इन पापों की पहचान कर उससे मुक्ति का प्रयास करें ।
जैन धर्म में वर्णित 18 पाप

जैन धर्म में 18 पाप के प्रकार निम्नलिखित हैं ।

1.प्रणातिपात- किसी भी जीव की हिंसा करना ,उसका वध कर देना, उसे जान से मार देना यह सबसे बड़ा पाप है ।

2. मृषावाद- असत्य वचन बोलना ,हमेशा झूठ बोलना यह सबसे बड़ा पाप है ।

3. अदत्तादान- किसी से पूछे बिना उसकी वस्तु लेना, चोरी करना यह पाप है ।

4. मैथुन - असंयमित होकर कुशील का सेवन करना पाप है।

5. परिग्रह - किसी वस्तु को संचित करना, द्रव्य आदि रखना ममता रखना पाप है।

आप कहेंगे क्यों ?

क्योंकि जो वस्तु हमारी आत्मा में कलेश उत्पन्न करें और उसके मूल स्वरूप में परिवर्तन लाए जिससे आत्मा अपनी पहचान खो जाती है ,वह पाप है।

6.क्रोध - खुद तपना ,दूसरों को तड़पाना, अत्यधिक क्रोध करना पाप है क्रोध सभी प्रकार की हानियों की जड़ है और यह पाप का मूल है।

7. मान- अंहकार (घमंड करना) पाप है ।

8. माया- ठगाई करना, कपट पूर्वक आचरण करना ।

9. लोभ - तृष्णा बढ़ना,अत्यधिक पाने की लालसा करना ।

10.राग- मनोज्ञ वस्तु पर स्नेह रखना, प्रीति करना । 

11.द्वेष- अमनोज्ञ वस्तु पर द्वेष करना ।

12. कलह - क्लेश करना ।

13. अभ्याख्यान - किसी पर झूठा कलंक लगाना ।

14. पैशुन्य- दूसरों की चुगली करना ।

15. परपरिवाद- दूसरों का अवर्णवाद (निन्दा) बोलना ।

16.रति अरति- पांच इंद्रियों के 23 विषयों में से मनोज्ञ वस्तु पर प्रसन्न होना, अमनोज्ञ वस्तु पर नाराज होना ।

17.मायामृषावाद- कपट सहित झूठ बोलना ।

18.मिथ्यादर्शन - असाधु को साधु समझना, कुदेव, कुगुरु कुधर्म पर श्रद्धा रखना ।

इस प्रकार उपरोक्त वर्णित 18 पापों को छोड़ देने से ही जीव की मुक्ति संभव होती है । इसलिए प्रत्येक जैन मुनि और जैन श्रावक छोटे से छोटे जीव की हिंसा के बारे में भी विचार करता है। 

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