--> भगवान ऋषभदेव जी | Jainism knowledge - Jain Dharma ka Gyan Saral Shabdo me

भगवान ऋषभदेव जी

भगवान ऋषभदेव जी इस पृथ्वी के प्रथम राजा थे । वे प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे । इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" रखा गया था ।

भगवान ऋषभदेव जी इस कालक्रम में जैन धर्म के प्रवर्तक है । भगवान ऋषभदेव जी जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर है । भगवान ऋषभदेव जी को आदिनाथ भी कहा जाता है । इन्के पिता का नाम नाभिराज तथा माता का नाम मरूदेवी था । इनके पिता कुलकर व्यवस्था कें अतिंम 15 वें कुलकर थे ।

भगवान ऋषभदेव जी इस पृथ्वी के प्रथम राजा थे । वे प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे । इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" रखा गया था ।

भगवान ऋषभदेव ने असी, मसी और कृषी का निर्माण किया था । गणित और बाह्नी लिपी भी प्रभु आदिनाथ की देन है ।

प्रभु ऋषभदेव जी के 100 पुत्र तथा दो पुत्रियाँ ब्रह्मी तथा सुंदरी जी थी । भगवान ऋषभदेव जी बाहुबली जी के पिता थे , जिनकी प्रतिमा गोमतेश्वर नामक तीर्थ में स्थित है ।

भगवान ऋषभदेव जी
भगवान ऋषभदेव जी

जन्म

भगवान ऋषभदेव जी का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था , जैन रामायण के अनुसार वह प्रभु श्री राम के पूर्वज थे । प्रभु ऋषभदेव भगवान की आयु 84 लाख पूर्व की थी ।

राजा के रूप में कार्य 

एक राजा के रूप में प्रभु ने इस पृथ्वी को असी, मसी, कृषी , व्यापार, गणित, ज्योतिष, अंक विद्या, चक्रवर्ती भरत को 72 कलाएं तथा बाह्नी जी को 64 कलाएँ सिखायी थी । समस्त वैभव इस पृथ्वी पर भगवान ऋषभदेव जी की ही देन है । युद्ध नीती, चतुरंगीनी सेना ,राजकाज का प्रशासन प्रभु ने ही सर्वप्रथम प्रारम्भ किया था ।

विवाह का प्रचलन

जैन मान्यतानुसार विवाह नाम की पवित्र पद्धति का प्रचलन भी प्रभु ऋषभदेव जी ने किया था । भरत चक्रवर्ती, ब्रह्मी और अन्य 98 पुत्रों की माता का नाम यशावती था। प्रभु बाहुबली और महासती सुंदरी जी की माता का नाम सुनंदा था।

दीक्षा लेने का घटनाक्रम

जब प्रभु ऋषभदेव जी ने इस पृथ्वी का भौतिक रूप से कल्याण कर दिया , तो जीवों के कल्याण के लिए मोक्ष मार्ग रूपी कल्याण धर्म जैन धर्म की स्थापना अभी बाकी थी , जीवों की अध्यात्मिक उन्नती के लिए प्रभु का दीक्षा लेना अति आवश्यक था । इसी विचार के लिए प्रभु इन्द्र ने एक योजना बनाई , उसने प्रभु ऋषभदेव जी की राज सभा में नीलांजना नाम की एक अप्सरा को भेजा जिसका आयुष कर्म बहुत कम शेष था ।

उस अप्सरा ने नयनाभिराम नृत्य किया और नृत्य करते - करते ही उसने प्राण त्याग दिये लेकिन इन्द्र के देव माया के प्रभाव से उसका स्थान अन्य अप्सरा ने ले लिया , ये घटना इतनी क्षणभंगुरता से हो गई किसी को कानोकान खबर भी नही हुई , परन्तु तीन ज्ञान के धारक प्रभु इन्द्र की इच्छा जान गये और कहा "ये संसार क्षणभंगुर है मै जल्द ही दीक्षा लेकर इस संसार को सर्व कल्याणात्मक अहिंसा धर्म से परिचित करवांऊगा।"

दीक्षा कल्याणक

प्रभु ऋषभदेव जी ने अपनी प्रतिज्ञानुसार गृह त्याग कर दीक्षा को स्वीकार किया । ये उस समय की प्रथम घटना थी , लोगो मे अलग हि कोलहल मच गया । प्रभु ऋषभदेव जी प्रथम तीर्थंकर, प्रथम राजा, प्रथम भिक्षु थे । संसार सागर को पार करने वाले निर्मल धर्म अहिंसा का प्रचार किया और अहिंसा परमो धर्म का उद्धघोष किया । प्रभु को दीक्षा रूप में देखकर उन्की माता ने उन्हे हाथी पर से बैठे-बैठे देखा और निर्मल कैव्लय ज्ञान कि प्राप्ती की और इस संसार मे सर्वप्रथम मोक्ष पद को पा गई । जैन मान्यतानुसार इस संसार मे सर्वप्रथम मोक्ष माता मरूदेवी को हुई थी ।

इन्द्र की प्रार्थना

प्रभु दीक्षा के समय जब अपने केशो का पंचमृष्टी से लोचन कर रहे थे , तो चार मुष्ठी लोच के बाद प्रभु के शीश पर केवल शिखा हि शेष रह गई थी , तभी इन्द्र ने प्रभु से आग्रह किया प्रभु आपके यह शिखा मनभावन प्रतीत हो रही है अतः आप इसे न उखाडे प्रभु ने इन्द्र का आग्रह स्वीकार कर अपने केशो को वैसे हि छोड दिया । इस घटना से प्रभु "केसरियानाथ" जी कहलाये । केवल प्रभु ऋषभदेव जी हि एकमात्र तीर्थंकर है जिन्के शीश पर शिखा विद्यमान थी ।

प्रभु ऋषभदेव जी का साधनाकाल

भगवान ऋषभदेव जी के दीक्षा लेने के उपरांत उन्हें 13 महीनों तक निर्दोष आहार की प्राप्ति नहीं हुई थी उस काल में कोई भी व्यक्ति निर्दोष आहार देना नहीं जानता था । प्रभु ने 13 महीनों तक अन्न का एक दाना तक न खाया था।

एक बार एक दिन एक दिव्य घटना घटी प्रभु  ऋषभदेव जी आहार के लिए निकले तभी उनका पौत्र श्रेयांस कुमार आया उसने देखा यह ईशु(गन्ने) रस अभी-अभी ताजा ही आया है और यह दीक्षा के लिए एकदम उपयुक्त है । 

ऐसा सोचकर उसने प्रभु को आहार स्वरूप ईशु रस प्रदान किया, प्रभु ने अपने ज्ञान से देखा कि यह आहार एकदम निर्दोष है, उन्होंने एकाएक हाथ बढ़ाकर ईशुरस को ग्रहण किया। इस प्रकार से प्रभु ने अपने 13 माह के उपवास का पारणा किया, यह दिन अक्षय तृतीया कहलाया आज आज भी अक्षय तृतीया पर ईशु रस का पान किया जाता है।

भगवान ऋषभदेव ने 1000 वर्ष तक कठोर तपस्या की जिसके पश्चात उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। वह अरिहंत सर्वज्ञ बन गये । उन्होने अपने चार घनघाती कर्मो का क्षय किया तथा अरिहंत भगवान्‌ कहलाये ।

जैन धर्म की स्थापना

कैवलय ज्ञान के पश्चात् प्रभु ने साधु, साध्वी, श्रावक व श्राविका नामक चार तीर्थो की स्थापना कि और स्वयं तीर्थंकर कहलाये । उन्होने सर्वकर्म ञाशक महामंगलदायी जैन धर्म की स्थापना की और पंचमहाव्रतो का प्रतिपादन किया । भगवान ऋषभदेव जी के 84 गणधर थे ।

मोक्ष

जब प्रभु का आयुष कर्म पूर्ण हुआ तो उन्होंने हिमालय पर्वत पर जाकर तीन दिवस का उपवास किया उसके पश्चात ध्यान लगाकर निर्वाण को प्राप्त हुए। उन्होने अपने अष्टकर्मो का क्षय कर निर्वाण प्राप्त किया और सिद्ध कहलाये । प्रभु के इस जनमंगल धर्म से असंख्यात जीव निर्वाण प्राप्त कर गये ।

COMMENTS

BLOGGER
नाम

Alochana-Path,5,Bhaktamar-Stotra,6,Gandhar,5,Jain-Aarti,27,Jain-Bhajan,4,Jain-chalisa,6,Jain-GK,1,Jain-Kahaniya,15,Jain-tatva-Gyan,15,Jain-vrat,5,Jainism,4,Jainism-FAQs,27,Jainism-Quiz,2,JainismVideos,1,Lord-Mahavira,7,Navkar-mantra,13,Samayik-Sutra,42,Stotra,25,Tirthankara,32,Vishisht-Vyakti,13,
ltr
item
Jainism knowledge - Jain Dharma ka Gyan Saral Shabdo me: भगवान ऋषभदेव जी
भगवान ऋषभदेव जी
भगवान ऋषभदेव जी इस पृथ्वी के प्रथम राजा थे । वे प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे । इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" रखा गया था ।
https://1.bp.blogspot.com/-W8dH2mK-_a0/XtOL7vKV08I/AAAAAAAABSQ/D3C72hAJyCAyDZNztWfQJ6ttvl5b8hCegCLcBGAsYHQ/s320/%25E0%25A4%25AD%25E0%25A4%2597%25E0%25A4%25B5%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A8%2B%25E0%25A4%258B%25E0%25A4%25B7%25E0%25A4%25AD%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25B5%2B%25E0%25A4%259C%25E0%25A5%2580.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-W8dH2mK-_a0/XtOL7vKV08I/AAAAAAAABSQ/D3C72hAJyCAyDZNztWfQJ6ttvl5b8hCegCLcBGAsYHQ/s72-c/%25E0%25A4%25AD%25E0%25A4%2597%25E0%25A4%25B5%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A8%2B%25E0%25A4%258B%25E0%25A4%25B7%25E0%25A4%25AD%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25B5%2B%25E0%25A4%259C%25E0%25A5%2580.jpg
Jainism knowledge - Jain Dharma ka Gyan Saral Shabdo me
//www.jainismknowledge.com/2020/05/rishabh-dev-ji.html
//www.jainismknowledge.com/
//www.jainismknowledge.com/
//www.jainismknowledge.com/2020/05/rishabh-dev-ji.html
true
357108966603092227
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content