भगवान अजितनाथ जी का जीवन परिचय

भगवान अजितनाथ जैन धर्म के द्वितीय तीर्थंकर थे । अजितनाथ प्रभु का जन्म अयोध्या के राजपरिवार में माघ के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन हुआ था। इनके पिता का नाम जितशत्रु राजा और माता का नाम विजया देवी था। तीर्थंकर अजितनाथ भगवान का प्रतिक चिह्न हाथी था।

जानिये - जैन धर्म में तीर्थंकर कौन होते है ?

द्वितीय तीर्थंकर प्रभु अजितनाथ जी
द्वितीय तीर्थंकर प्रभुजी अजितनाथ जी

जन्म

प्रभु अजितनाथ जी का जन्म माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था , प्रभु का जन्मकल्याणक 64 इन्द्रो के द्वारा प्रभु का अभिषेक किया गया ।

दीक्षा

उचित समय आने पर भगवान अजितनाथ ने दीक्षा ग्रहण की , प्रभु ने पंचमुष्ठी लोच कर दिगम्बर वेश धारण कर दीक्षा ग्रहण की और दीक्षा के समय मनः पर्व ज्ञान की प्राप्ती हुई । जिस दिन प्रभु ने दीक्षा ग्रहण की जैन आगमों के अनुसार उस दिन रोहिणी नक्षत्र था ।

साधना काल

प्रभु अजितनाथ के साधनाकाल की अवधी 12 वर्ष थी । प्रभु ने इन 12 वर्षो में अपने समस्त कर्मो का नाश कर दिया , और 4 घनघाती कर्मो का क्षय कर अरिहंत कहलाये । 

भगवान अजितनाथ जी को दीक्षा के पश्चात् सर्वप्रथम दान बह्दत नामक राजा के द्वारा भिक्षा कि प्राप्ती हुई । इस प्रकार से बह्दत प्रथम दानदाता हुआ ।

धर्म कि स्थापना और कैव्लय ज्ञान की प्राप्ती

भगवान अजितनाथ ने अपने 12 वर्ष के साधनाकाल के उपरांत अयोध्या नगरी में पधारे वहाँ प्रभु ने बेले का उपवास किया था, सहस्त्राम्रवन में शाल वृक्ष के नीचे प्रभु निर्मल कैव्लय ज्ञान को पा गये । प्रभु सर्वज्ञ हो गये । प्रभु को जिस दिन कैव्लय ज्ञान हुआ उस दिन पोष सुदी एकादशी थी ।

प्रभु अरिहंत हो गये , इसके पश्चात् प्रभु ने जगत् कल्याणकारी
जैन धर्म का प्रचार किया , और साधु , साध्वी, श्रावक, श्राविका चार तीर्थों कि स्थापना कर तीर्थंकर कहलाये ।
प्रभु के प्रथम गणधर का नाम सिंहसेन था , प्रभु अजितनाथ जी के गणधरो की संख्या 90 थी

निर्वाण कि प्राप्ती

प्रभु अजितनाथ जी का मोक्ष कल्याणक चैत्र सुदी पंचमी के दिन सम्मेद शिखरजी में हुआ था । प्रभु खडगासन कि मुद्रा में ध्यान लगाये मासखमण का उपवास कर अपने अष्टकर्मो का क्षय कर सिद्ध कहालाये और निर्वाण पा गये ।

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" जय जिनेन्द्र "

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