--> जैन धर्म में गणधर क्या होते हैं ? | Jainism knowledge - Jain Dharma ka Gyan Saral Shabdo me

जैन धर्म में गणधर क्या होते हैं ?

गणधर इन्हीं चार तीर्थों को संयोकर समूह बनाते हैं। गणो को धारण करने के कारण ही वह गणधर कहलाते हैं,गणधरो का क्रम तीर्थंकर के पश्चात आता है

जैन धर्म में गणधर तीर्थंकर के शिष्य होते हैं। जैन धर्म में तीर्थंकरों की संख्या 24 है, प्रत्येक तीर्थंकर के शिष्य होते हैं ,जिन्हें गणधर कहा जाता है। जैन तीर्थंकरों के शिष्य गणधर कहलाते हैं। जिस प्रकार जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हैं,उसी प्रकार 24 तीर्थंकरों के कुल 1452 गणधर हुए हैं।

प्रथम गणधर श्री गौतम स्वामी जी

प्रभु महावीर के प्रथम गणधर श्री गौतम स्वामी जी
जैन धर्म में तीर्थंकर धर्म प्रवर्तक होते हैं वह चार तीर्थों की स्थापना करते हैं। गणधर इन्हीं चार तीर्थों को संयोकर समूह बनाते हैं। गणो को धारण करने के कारण ही वह गणधर कहलाते हैं। भगवान महावीर के समय प्रमुख कार्यों को 10 गणो में विभाजित किया गया था, इन्हीं 10 गणो के प्रमुख 11 गणधर कहलाए।


गणधरो का क्रम तीर्थंकर के पश्चात आता है ,जैन परंपरा में सबसे पहले तीर्थंकर उसके बाद गणधर और उसके बाद आचार्य आते हैं,आचार्यों के पश्चात साधु गिने जाते हैं।
गणधर जैन तीर्थंकरों के वचनों को सूत्रों में लिपिबद्ध करते हैं,भगवान महावीर के समय उनके वचनों को पूर्व (ग्रंथ का नाम)में संग्रहित किया गया था, जो आगामों का आधार बने थे।

गणधर भगवान की वाणी को सूत्रों में लिपिबद्ध करते हैं, संघ का संचालन करते हैं, कठोर आचार्य नियमों का पालन करते हैं , सयंम से जीवन जीते हैं और अंततः समस्त कर्मों का क्षय कर निर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति करते हैं।

गणधर द्वादश अंगों में पारंगत होते हैं वह ज्ञान दर्शन और चरित्र के उत्तम धर्म का पालन करते हैं।
प्रत्येक तीर्थंकरों के गणधरो की संख्या अलग अलग होती है।

भगवान ऋषभदेव के 84 गणधर और भगवान महावीर के 11 गणधर थे ,इनमें से भगवान महावीर के प्रथम गणधर गौतम स्वामी प्रसिद्ध है।

गणधर पद प्रदान विधि

वर्तमान काल में आचार्य पद प्रदान के अवसर पर जिस प्रकार विधि-विधान, मंगल उत्सव होते हैं, उस प्रकार गणधर पद-प्रदान के समय किन्हीं विशेष आयोजन का उल्लेख आगम में नहीं है। पर, आवश्यक चूर्णी, त्रिशष्टिश्लाका पुरुष चरित्र आदि ग्रंथों में प्रभु ने समवसरण में समस्त उपस्थितों के सामने एक पंक्ति में खड़े गणधरों को क्रमश: "मैं तुम्हें तीर्थ की अनुज्ञा देता हूँ " कहकर उनके सिर पर सौगंधिका चूर्ण (वासक्षेप ) डालकर घोषणा की जाती है, ऐसा उल्लेख मिलता है । सुधर्मास्वामीजी को भावी पट्टधर समझकर दुबारा वासक्षेप डाला गया यह भी उल्लेखित है ।

गणधर प्रभु को उपदेश

तीर्थंकर प्रभु का प्रत्येक शिष्य गणधर नही होता अर्थात्‌ ये आवश्यक है कि प्रत्येक गणधर तीर्थंकर प्रभु के शिष्य होते है ।

जैसे -: भगवान महावीर का शिष्य गौशालक, जमाली आदी थे परन्तु वे गणधर नही थे , गौतम स्वामी जी प्रभु महावीर के शिष्य थे और गणधर भी थे । ऐसा इसलिए क्योकी वे हि जिन्हे त्रिपदी का उपदेश प्राप्त होता है , वे गणो को धारण करते है , गणधर कहलाते है ।

तीर्थंकर महाप्रभु तीर्थ की स्थापना होने के बाद गणधर भगवंतों को उत्पाद, व्यय व ध्रौव्य की त्रिपदी का उपदेश देते है । तीर्थंकर प्रभु का अतिशय युक्त उपदेश के प्रभाव तथा पूर्वजन्म की उनकी उत्कृष्ट साधना के परिणामस्वरूप इस त्रिपदी को सुनकर उसी क्षण गणधर भगवंतों के श्रुतज्ञानावर्णीय कर्म का विशिष्ट क्षयोपशम होता है और वे उसी समय श्रुतज्ञान भंडार के विशिष्ट ज्ञानी बन जाते है । प्रभु के उपदेश बाद वे सर्वप्रथम पूर्व की रचना करते है ।

COMMENTS

BLOGGER: 1
कृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।

नाम

Alochana-Path,5,Bhaktamar-Stotra,6,Gandhar,5,Jain-Aarti,27,Jain-Bhajan,4,Jain-chalisa,6,Jain-GK,1,Jain-Kahaniya,15,Jain-tatva-Gyan,15,Jain-vrat,5,Jainism,4,Jainism-FAQs,27,Jainism-Quiz,2,JainismVideos,1,Lord-Mahavira,7,Navkar-mantra,13,Samayik-Sutra,42,Stotra,25,Tirthankara,32,Vishisht-Vyakti,13,
ltr
item
Jainism knowledge - Jain Dharma ka Gyan Saral Shabdo me: जैन धर्म में गणधर क्या होते हैं ?
जैन धर्म में गणधर क्या होते हैं ?
गणधर इन्हीं चार तीर्थों को संयोकर समूह बनाते हैं। गणो को धारण करने के कारण ही वह गणधर कहलाते हैं,गणधरो का क्रम तीर्थंकर के पश्चात आता है
https://1.bp.blogspot.com/-E81DMtxAMxc/XeZXDl0d29I/AAAAAAAAAWM/IT3STXQpssw2H3WSDvCs5wk6C13l4LZIwCPcBGAYYCw/s400/%25E0%25A4%2597%25E0%25A4%25A3%25E0%25A4%25A7%25E0%25A4%25B0.jpeg
https://1.bp.blogspot.com/-E81DMtxAMxc/XeZXDl0d29I/AAAAAAAAAWM/IT3STXQpssw2H3WSDvCs5wk6C13l4LZIwCPcBGAYYCw/s72-c/%25E0%25A4%2597%25E0%25A4%25A3%25E0%25A4%25A7%25E0%25A4%25B0.jpeg
Jainism knowledge - Jain Dharma ka Gyan Saral Shabdo me
//www.jainismknowledge.com/2020/05/gandhara-in-jainism.html
//www.jainismknowledge.com/
//www.jainismknowledge.com/
//www.jainismknowledge.com/2020/05/gandhara-in-jainism.html
true
357108966603092227
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content