प्रभु पद्मप्रभु जी

पद्मप्रभु जी जैन धर्म के 6वें तीर्थंकर है । पदम प्रभु का जन्म कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन इक्ष्वाकु कुल में कोशाम्बी नगरी मे हुआ था ।
प्रभु के पिता का नाम श्रीधर तथा माता का नाम सुसीमा था । प्रभु की देह का रंग लाल रंग का था, प्रभु का प्रतीक चिन्ह कमल का पुष्प था, जिस वजह से प्रभु का नाम पदम प्रभु कहलाया ।

पद्मप्रभु जी
पद्मप्रभुजी
पदम प्रभु की आयु 3000000 पूर्व थी,प्रभु के शरीर का आकार ढाई सौ धनुष का था । 
पदम प्रभु ने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन चित्रा नक्षत्र में दीक्षा ग्रहण की इसके पश्चात प्रभु ने साधना काल में अपने समस्त कर्मों का क्षय किया और चैत्र शुक्ल पूर्णिमा के दिन चित्रा नक्षत्र में प्रभु ने कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया और अरिहंत कहलाए । 
इसके पश्चात प्रभु ने साधु साध्वी श्रावक श्राविका नामक चार तीर्थों की स्थापना की और तीर्थंकर कहलाए । प्रभु के 111 गणधर थे ।
उसके पश्चात फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी के दिन प्रभु ने निर्वाण प्राप्त किया ।


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