Bhaktamar Stotra Shloka-10 With Meaning

Abhishek Jain
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 Bhaktamar Stotra Shloka-10 With Meaning

भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का महान प्रभावशाली स्तोत्र है । इस स्तोत्र की रचना आचार्य मानतुंग ने की थी । 

इस स्तोत्र की रचना संस्कृत भाषा में हुई थी , जो इस स्तोत्र की मूल भाषा है, परन्तु यदी आपको संस्कृत नही आती तो आपकी सुविधा के लिए Bhaktamar Stotra के श्र्लोको (Shloka) को हमने मूल अर्थ के साथ - साथ हिन्दी में अनुवादित करते हुये उसका अर्थ भी दिया है , साथ हि साथ जिन लोगो को English आती है और संस्कृत नही पढ सकते वह सधार्मिक बंधु भी English मे Bhaktamar stotra का पाठ कर सकते है । इस प्रकार से Bhaktamar Stotra Shloka-10 With Meaning की सहायता से आप आसानी से इस स्तोत्र का पाठ कर सकते है ।

चाहे भाषा कोई भी हो हमारी वाणी से श्री आदीनाथ प्रभु का गुणगाण होना चाहिए । नित्य प्रातः काल मे पूर्ण शुद्धता के साथ श्री भक्तामर स्तोत्र का पाठ अवश्य करें ।

यह भी देखें - जैन धर्म के पंच महाव्रत कौन से है ?


Bhaktamar Stotra Shloka-10

Bhaktamar Stotra Shloka - 10

कूकर विष निवारक

(In Sanskrit)

नात्यद्भुतं भुवन-भूषण-भूतनाथ,

भूतैर्गुणैर्भुवि भवंत-मभिष्टु-वंतः ।

तुल्या भवंति भवतो ननु तेन किं वा,

भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥10॥

(In English)

natyad -bhutam bhuvana-bhushana bhutanatha

bhutaira gunair -bhuvi bhavantamabhishtuvantah

tulya bhavanti bhavato nanu tena kim va

bhutyashritam ya iha natmasamam karoti || 10 ||

Explanation (English)

O Lord of beings ! O Ornament of the universe! It is no 

wonder that he who is engaged in praising your infinite 

virtues (imbibing the virtues in his conduct) attains 

your exhilarated position.It should not be surprising if 

a benevolent master makes his subjects his equals. In 

fact, what is the purpose of serving a master who does 

not allow his subjects to prosper to an elevated 

position like his ?

(हिन्दी में )

नहिं अचंभ जो होहिं तुरंत, तुमसे तुम-गुण वरणत संत |

जो अधीन को आप समान, करे न सो निंदित धनवान ||१०||

(भक्तामर स्तोत्र के दसवें श्लोक का अर्थ )

हे जगत् के भूषण! हे प्राणियों के नाथ! सत्यगुणों के द्वारा आपकी स्तुति करने वाले पुरुष पृथ्वी पर यदि आपके समान हो जाते हैं तो इसमें अधिक आश्चर्य नहीं है| क्योंकि उस स्वामी से क्या प्रयोजन, जो इस लोक में अपने अधीन पुरुष को सम्पत्ति के द्वारा अपने समान नहीं कर लेता |


" भगवान ऋषभदेव जी की जय "


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