गौतम ! मत प्रमाद करो - जैन भजन

Abhishek Jain
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गौतम स्वामी जी

गौतम ! मत प्रमाद करो

ज्यों तरल ओस के जल-बिन्दु गिर कुशा - अंक में जाते हैं।
वह कुशा - गोद में पढ़े हुए, मोती सी शोभा पाते हैं।
पर चढ़े ज्यू ही दिनकर नम पर, पा तेज वहीं ढल जाते हैं।
इसी भांति से जग के प्राणी, मर-मर कर मरघट जाते हैं ।
इसलिये पाप से दूर रहो, और मरणकाल को याद करो ।
तुम सत्य धर्म के पालन में, हे गौतम ! मत प्रमाद करो।।1।।

रे जीव ! तुम्हारा तन अन्दर भी, रहना सदा निवास नहीं ।
यह जीवन प्रियवर ! नश्वर है, इसका भी तो विश्वास नहीं ॥
इस दुर्लभ जीवन को पाकर, जो पापी पाप कमाते हैं ।
वह अधोगति में जाकर के, फिर रो-रो कर दुख पाते है ।
हे गौतम ! तुम तो ज्ञानी हो, अब कर्म मैल को दूर करो ।
हे गौतम ! अपने जीवन को, तप-संयम से भरपूर करो ॥
तुम कल-कल करके जीवन की, शुभ घड़ियां मत बरबाद करो ।
तुम सत्य धर्म के पालन में, हे गौतम मत प्रमाद करो ।।2।।

तन फूल का आर्य धरती पर, हे गौतम खिलना दुर्लभ है।
उत्तम जाति का मानव को, हे गौतम ! मिलना दुर्लभ है ।
शास्त्र - रस का पान जीव यह, कभी कभी ही करता है।
यह संयम के पथ पर श्रद्धा से कभी कभी पग धरता है ।।
यह सब कुछ पाकर हे गौतम ! न मन अपना आजाद करो ।
तुम सत्य धर्म के पालन में, हे गौतम ! मत प्रमाद करो ।।
 हे गौतम ! तेरे केशों का, कालापन उड़ता जाता है ।
बल नयनों का, बल कानों का, बल हर इक घटता जाता है ।
हे गौतम ! तेरा कलिका सा, हर दंत उखड़ता जाता है ।
तन सुन्दर कोमल पर देखो, यह चढ़ा बुढ़ापा आता है ।।
इसलिए पाप से दूर रहो, और अंतकाल को याद करो ।
तुम सत्य धर्म के पालन में, हे गौतम ! मत प्रमाद करो ।।3।।

तुम मोह-माया के बन्धन को, हे गौतम ! अब तो तोड़ चुके ।
तुम भोग भरी इस दुनिया को, हे गौतम ! मन से छोड़ चुके ।।
सब राजे और महाराजे, तेरे चरणों पर पड़े हुए।
 हे गौतम ! तुम तो संयम के, उत्तम मार्ग पर चढ़े हुए।
ज्यों कमल नदी का अंगों से, नहीं कीचड़ को लिपटाता है ।
इस तरह बनो तुम निर्मोही, यह राग बड़ा दुख दाता है ।।
अब निकट किनारा आया है, न भोगों को अब याद करो ।
तुम सत्य धर्म के पालन में, हे गौतम ! मत प्रमाद करो ।।4।।

" जय जिनेन्द्र " 



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