पुष्प का भाग्य (जैन कहानी)

भगवान महावीर की साधना का दसवां वर्ष चल रहा था। भगवान महावीर के साथ मंखली पुत्र गोशाल नाम का एक उदंड व्यक्ति भी साथ-साथ विचरण कर रहा था। मंखली पुत्र गौशाल अपने स्वभाव के कारण प्रत्येक जगह झगड़ा पैदा कर देता था, वह समस्याओं को स्वयं ही अपनी तरफ बुलाता था।
एक बार की बात है भगवान महावीर और मंखली पुत्र गौशाल सिद्धार्थपुर पहुंचे,कुछ दिन वहां रहने के पश्चात कूर्मग्राम में जा रहे थे।
रास्ते में एक तिल के पौधे को देखकर गौशाल ने पूछा "प्रभु इस पौधे का भविष्य क्या होगा ? यह पौधा उत्पन्न होगा भी या नहीं अगर उत्पन्न होगा तो एक फली में कितने दाने होंगे ?"
भगवान महावीर ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया - "यह पौधा अवश्य ही फल उत्पन्न करेगा,फूल वाले पौधे की एक फली में से सात (7) दाने निकलेंगे।"
गौशाला को प्रभु की बात पर विश्वास नहीं हुआ वह अपने स्वभाव के अनुसार प्रभु को गलत करने पर उतारू हो गया जैसे ही भगवान महावीर ने पीठ फेरी उसने उस पौधे को उखाड़ दिया और कहा जब पौधा ही नहीं रहेगा तो दाने कहां से आएंगे।
इस के पश्चात भगवान महावीर और मंखली पुत्र गौशाल कूर्मग्राम में पधारे। कुछ समय भगवान महावीर और मंखली पुत्र गौशाल ने उस गांव में ही बिताया।

भगवान महावीर
 भगवान महावीर

कुछ समय पश्चात भगवान महावीर ने अपना विहार पुनः सिद्धार्थपुर की तरफ किया। जब भगवान महावीर उस तिलवाले पौधे वाले स्थान की तरफ से गुजर रहे थे, तब मंखली पुत्र गौशाल ने कहा-"प्रभु आप की भविष्यवाणी झूठी हो गई,आपके द्वारा बताया हुआ पौधा तो उगा ही नहीं, मैंने तो उसे उखाड़ कर फेंक दिया था।"
इस पर भगवान महावीर मुस्कुराए और बोले - "तुमने जो पौधा उखाड़ कर फेंका था, वह है वहां दूसरी तरफ मिट्टी में स्थापित हो गया था । उसके पश्चात वर्षा के कारण उसने भूमि में पकड़ बना ली थी। इस प्रकार से यह वही पौधा है जिसके बारे में तुमने मुझसे पूछा था।"
उसके पश्चात गौशाला उस पौधे के पास जा कर देखता है और एक फली तोड़ता है और उसके बीजों को गिनता है। उस फली में से सात बीज निकलते हैं और उसे विश्वास होता है कि यह तो वही पौधा है, इसके पश्चात गौशालक प्रभु महावीर से अपनी उद्दंडता के लिए क्षमा मांगता है परंतु उसका विश्वास नियतिवाद पर गहरा हो जाता है।
यह उस पुष्प वाले पौधे का भाग्य था, जिसे प्रभु ने फरमाया था चाह कर भी गौशाला उस पौधे का अहित न कर सका।


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" जय जिनेन्द्र "

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