जैन धर्म के छः द्रव्य

जिसमें गुण और पर्याय दोनों होते हैं, उसे द्रव्य कहते है। गुण का अर्थ है-सदा साथ में रहने वाला धर्म और पर्याय का अर्थ है-बदलने वाला धर्म।

जैसे-जीव का गुण है ज्ञान और पर्याय है सुख-दुःख आदि । द्रव्य छह हैं-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, प्राकाशास्तिकाय, काल, पुद्गलास्तिकाय और जीवास्तिकाय । यस्ति का अर्थ है-प्रदेश, और काय का अर्थ है-समूह । प्रदेश समूह को अस्तिकाय कहते हैं । काल-एक समय मात्र का होता है, उसके प्रदेश नहीं होता । इसलिए इसको अस्तिकाय नहीं कहा जाता।

जैन धर्म (द्रव्य)


१. धर्मास्तिकाय

जीव और पृद्गल दोनों गतिशील हैं । उनकी गति में जो उदासीन भाव से सहयोग देता है, उस द्रव्य को धर्मास्तिकाय कहते हैं । यह द्रव्य जीव और पुद्गल को गति नहीं कराता, किन्तु जो गति करते हैं उन में सहायक होता है ।
जैसे-पानी मछली को तैराता नहीं किन्तु उसके तैरने में सहयोगी बनता है। हम अंगुली हिलाते हैं, शरीर में रक्त का संचार होता है, यह सब इसी द्रव्य के माध्यम से होता है।

२. अधर्मास्तिकाय

जो जीव और पुद्गल को ठहरने में सहयोग देता है, उसे अधर्मास्तिकाय कहते हैं । 
उदाहरण - : चिलचिलाती धूप में पथिक जा रहा है । आम्रवृक्ष की छाया देखकर वह बैठ जाता है, ठहर जाता है। छाया पथिक के ठहरने में सहयोगी बनी, उसी प्रकार यह द्रव्य ठहरने में सहयोगी बनता है।

३. आकाशास्तिकाय

जो जीव और पुद्गल को रहने के लिए स्थान देता है, उसे आकाश कहते हैं। वह दो प्रकार का है  लोकाकाश और अलोकाकाश । जहां छहों द्रव्य होते हैं उसे लोकाकाश कहते हैं,और जहां मात्र आकाश ही हो उसे अलोकाकाश कहते हैं।

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४. काल

जो रात-दिन का निमित्त है, जो वस्तुओं की पर्यायों के बदलने का हेतु है, उसे काल कहते हैं।
जैसे -: समय, मिनट, घड़ी,दिन, रात आदि को व्यवहार में काल कहा जाता है।

५. पुद्गलास्तिकाय

जो वर्ण, गंध, रस, स्पर्श युक्त होता है वह पुद्गलास्तिकाय है। पुद्गलस्तिकाय का स्वभाव 'परिवर्तन' होना है। हम पदार्थ में जो परिवर्तन देखते हैं, वह पुद्गलास्तिकाय का ही स्वभाव है।

६. जीवास्तिकाय

जो चेतनावान् है, ज्ञानवान् है, जो जानता है, देखता है,जीवास्तिकाय है। ये छहों द्रव्य लोक में पाए जाते हैं । अलोक में केवल एक आकाशास्तिकाय ही पाया जाता है, क्योंकि वहां गति और स्थिति के माध्यम द्रव्य नहीं हैं।

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" जय जिनेन्द्र ".

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