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अर्जुन माली की कहानी (जैन कहानी)

राजगृह नगर में अर्जुन नामक एक मालाकार अर्थात् माली रहता था। उसका नगर के बाहर एक बहुत सुन्दर व्यावसायिक उद्यान था। उसी उद्यान के मध्य में उसके कुलदेवता मुद्गरपाणी यक्ष का यक्षायतन था। अर्जुन बहुत सवेरे उठकर अपनी भार्या बन्धुमती के साथ उसी उद्यान में पहुँचता था और वह उस उद्यान में भिन्न-भिन्न रंगों एवं बहुविध जातियों के पुष्पों को चुनकर गुलदस्ते, गजरे, हार और मालाएं बनाता था और वह इन सबको नगर में विक्रय करता था, उस विक्रय से वह जो धन प्राप्त करता था । उसी से वह अपनी आजीविका चलाता था।

अर्जूनमाली पर सकंट

एकदा राजगृह के कतिपय दुष्टजनों का एक समुदाय उस उद्यान में पहुँच गया, उस दुष्ट समूह में छह व्यक्ति थे, उन्होंने बन्धुमति के सुकुमार सौन्दर्य पर मुग्ध होकर दुराचार करना चाहा उन दुष्ट आत्माओं ने अर्जुन माली को रस्सियों से बाँध दिया और उसके पश्चात् बन्धुमति को. घेरकर उसके साथ स्वछन्दरूपेण कामाचार किया। अर्जुन माली अपनी नाक के नीचे दुष्टों का अत्याचार एवं अपनी पत्नी का दुराचार देखकर अत्यधिक वज्राघात का अनुभव करने लगा, उसका खून खौल उठा। वह रस्सियों से जकड़ा था अतएव क्या कर सकता था। 

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अर्जुनमाली द्वारा यक्ष मुद्गरपाणी को पुकारना

वह इसी विचार में निमग्न हो उठा कि मैं दीर्घकाल से मुद्गरपाणी यक्ष की अर्चना-उपासना करता आया हूँ पर मुझे यक्ष से इस विपत्ति की वेला में किसी भी प्रकार का कोई सहयोग नहीं मिल पा रहा है। उसने क्रोधावेश में यक्ष को कोसना प्रारम्भ कर दिया-अरे यक्ष ! तुम प्रस्तर की भाँति निश्चेष्ट होकर मेरा अपमान देख रहे हो। तुम में कुछ भी सत्व नहीं है। इतने में यक्ष अर्जुन माली के शरीर में प्रविष्ट हो गया। उसी क्षण समग्र बन्धन छिन्न-भित्र हो गए। अर्जुन माली क्रोधावेश में उन्मत्त-सा हो गया और मुद्गर हाथ में लिए दैत्य की भाँति उठा एवं वह कामरत छह पुरुषों और अपनी पत्नी की हत्या कर देता है तथापि उसका क्रोध उपशांत नहीं हुआ ,उसके अन्तर्मन मे घृणा का भाव जाग उठा , वह क्षुधातुर सिंह की भाँति प्रतिदिन मनुष्यों पर झपटकर छह पुरुष और एक स्त्री की हत्या करके ही दम लेता था।

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यक्ष का उग्र उपसर्ग

कतिपय दिनों में ही सुरम्य उद्यान के परिपार्श्व में नर कंकालों का अम्बार- सा लग जाता है । अर्जुन माली के इस आतंक से जनता का आवागमन अवरुद्ध हो गया । गलियों और राजमार्गों में शून्यता व्याप्त हो गई , इतना ही नहीं राजगृह के द्वार भी बन्द कर दिए गए और किसी भी नागरिक को नगर के बाहर अर्जुन माली की दिशा में जाने का प्रतिरोध कर दिया गया |

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तीर्थंकर महावीर प्रभु का आगमन

उसी प्रसंग पर ज्योतिर्मय प्रभु महावीर ने राजगृह में पदार्पण किया जिससे जनता जनार्दन में अभय का संचार हुआ अर्जुन माली के भीषण आतंक के कारण सहस्र श्रद्धालु मानव तीर्थंकर प्रभु के दर्शन करने की लिए बैठे हुए उत्सुकता हैं किन्तु कोई भी व्यक्ति सत्साहस करने में कृतसकल्प नहीं हो सका, इतने में सुदर्शन नामक श्रावक ने महाप्रभु के दर्शन हेतु जवान की ओर जाने का सुदृढ़ निश्चय किया और वह अपने संकल्प का सहारा लेकर नगर द्वार के बाहर निकला।

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सेठ सुदर्शन की धर्म पर दृढ़ता

जहाँ पर पाँच महिने और तेरह दिन में अर्जुन माली ने 1141 मनुष्यों को मौत के घाट उतार दिया था, मृत्यु साक्षात् रूप में नृत्य कर रही थी किन्तु अभयमूर्ति सुदर्शन सुदृढ़ता के साथ अग्रसर हो रहा था। अर्जुन अपनी ओर आते हुए मनुष्य को देखकर उन्मत्त गज की भाँति मुद्गर लेकर उस और दौड़ा। श्रेष्ठी सुदर्शन अपनी और अर्जुन को आते देखकर सागारी संथारा कर, ध्यानस्थ हो गया। अर्जुन ने मुद्गर घुमाकर श्रेष्ठी सुदर्शन को ललकारा, किन्तु श्रेष्ठी ध्यानमुद्रा में अवस्थित था। एक ओर हिंसा की आसुरी शक्ति पूर्ण रूपेण प्रगट थी तथा दूसरी ओर अहिंसा की दैवी शक्ति मुखर थी। कुछ क्षणों तक परस्पर में संघर्ष-सा चल रहा था अन्ततः दैवी शक्ति के समक्ष आसुरी शक्ति सर्वथारूपेण पराजित हो गई । यक्ष सुदर्शन के आध्यात्मिक दिव्य तेज को सह न सका और वह अर्जुन के शरीर में से निकल गया और अर्जुन निष्प्राण शाखा की भाँति गिर पड़ा ।

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सेठ सुदर्शन द्वारा अर्जुन माली को धर्म का प्रतिबोध

सुदर्शन ने ध्यान से निवृत्त होकर गिरे हुए अर्जुन को उठाया, उसकी क्रूरता और दानवता को करुणा और स्नेह देते हुए कहा- हे अर्जुन ! तुम भयग्रस्त न बनो , तुम भी मनुष्य हो , तुम्हारे रक्त में दानवता के संस्कार प्रविष्ट हुए हैं , तुमने इसलिए शताधिक अर्जुन अणगार पूर्णत: सहिष्णु बने रहते थे क्षमाधर्म की प्रतिकृति के रूप में रहते थे । ' तितिक्षा ही परम धर्म है । छह मास की अतीव कठोर तपश्चर्या के हाथों से दुलारने लगा ।

अर्जुन सुदर्शन के चरणों में गिर पड़ा और वह अपने कृत कर्मों पर पश्चाताप करने लगा। सुदर्शन ने उसे प्रतिबोध निरपराध प्राणियों के प्राणों को हनन किया है, अब तुम प्रबुद्ध हुए हो, तुम्हारे दानवीय संस्कारों में परिवर्तन आ चुका है। मैं तुम्हें हमारे परम कल्याणकारी देवाधिदेव के समीप ले चलूँ।” अर्जुन माली श्रेष्ठी सुदर्शन के साथ-साथ भगवान महावीर के श्री चरणों में पहुँचा। महाप्रभु का सान्निध्य अपावन को भी पावन बना देता है।

प्रभु महावीर द्वारा अर्जुन माली की मुक्ती का उपदेश

महाप्रभु ने आत्मस्पर्शी उपदेश की सुधावृष्टि की जिससे अर्जुन माली की रक्त की दानवीय ऊष्मा परिशान्त हुई, दया एवं करुणा की रसधारा फूट पड़ी, उसने पश्चाताप के आँसू बहाकर तीर्थंकर महाप्रभु के समक्ष प्रायश्चित किया और उसी क्षण आहती प्रव्रज्या अंगीकार की। जनमानस अर्जुन को मुनि के रूप में देखकर आवेश में आ गया। अर्जुन मुनि बेले-बेले की तपश्चर्या में संलग्न हुए वे जब भी पारणे के दिन राजगृह नगर में पहुँचते तब नागरिकजन उन्हें उलाहना देते थे, भीषण रूप से भर्त्सना करते थे, उन पर गालियों की बौछार करते थे ताड़ना-तर्जना और प्रहार भी करते थे और यह कहते थे कि यही है हमारे स्वजन-परिजन का हत्यारा। यहाँ तक कि कई जन स्थान-स्थान पर उन्हें मारते-पीटते भी थे। किन्तु अर्जुन अणगार पूर्णतः सहिष्णु बने रहते थे क्षमाधर्म की प्रतिकृति के रूप में रहते थे। 'तितिक्षा ही परम धर्म है। छह मास की अतीव कठोर तपश्चर्या के पश्चात् अनशन कर सर्वकर्मों से विमुक्त होकर सिद्ध बुद्ध दशा को प्राप्त हुए। वस्तुतः अर्जुन जन्मना आर्य थे किन्तु उनमें अनार्यता के संस्कार व्याप्त हुए। भगवान महावीर ने संस्कार विशुद्धि की प्रक्रिया के माध्यम से क्रूरता के उस दैत्य को समता और करुणा का साक्षात् देव बनाया।

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" जय जिनेन्द्र ".

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