Bhaktamar Stotra Shloka-12 With Meaning

Abhishek Jain
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Bhaktamar Stotra Shloka-12 With Meaning

भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का महान प्रभावशाली स्तोत्र है । इस स्तोत्र की रचना आचार्य मानतुंग ने की थी । इस स्तोत्र की रचना संस्कृत भाषा में हुई थी , जो इस स्तोत्र की मूल भाषा है, परन्तु यदी आपको संस्कृत नही आती तो आपकी सुविधा के लिए Bhaktamar Stotra के श्र्लोको (Shloka) को हमने मूल अर्थ के साथ - साथ हिन्दी में अनुवादित करते हुये उसका अर्थ भी दिया है , साथ हि साथ जिन लोगो को English आती है और संस्कृत नही पढ सकते वह सधार्मिक बंधु भी English मे Bhaktamar stotra का पाठ कर सकते है । इस प्रकार से Bhaktamar Stotra Shloka-12 With Meaning की सहायता से आप आसानी से इस स्तोत्र का पाठ कर सकते है ।

चाहे भाषा कोई भी हो हमारी वाणी से श्री आदीनाथ प्रभु का गुणगाण होना चाहिए । नित्य प्रातः काल मे पूर्ण शुद्धता के साथ श्री भक्तामर स्तोत्र का पाठ अवश्य करें ।

Bhaktamar Stotra Shloka-12
Bhaktamar Stotra Shloka - 12

हस्तिमद-निवारक

(In Sanskrit)

यैः शांत-राग-रुचिभिः परमाणु-भिस्त्वं,

निर्मापितस्त्रि-भुवनैक-ललाम-भूत ।

तावंत एव खलु तेप्यणवः पृथिव्यां,

यत्ते समान-मपरं न हि रूपमस्ति ॥12॥

(In English)

yaih shantaragaruchibhih paramanubhistavam

nirmapitastribhuvanaika lalama-bhuta|

tavanta eva khalu teapyanavah prithivyam

yatte samanamaparam na hi rupamasti || 12 ||

Explanation (English)

O Supreme Ornament of the three worlds! As many indeed 

were the atoms filled with lustre of non-attachment, 

became extinct after constituting your body, therefore I 

do not witness such out of the world magnificence other 

than yours.

(हिन्दी में )

प्रभु! तुम वीतराग गुण-लीन, जिन परमाणु देह तुम कीन |

हैं कितने ही ते परमाणु, या तें तुम समरूप न आनु ||१२||

(भक्तामर स्तोत्र के बारहवें श्लोक का अर्थ )

हे त्रिभुवन के एकमात्र आभुषण जिनेन्द्रदेव! जिन रागरहित सुन्दर परमाणुओं के द्वारा आपकी रचना हुई वे परमाणु पृथ्वी पर निश्चय से उतने ही थे क्योंकि आपके समान दूसरा रूप नहीं है |


" भगवान ऋषभदेव जी की जय "


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