पद्मावती स्तोत्र

श्री शुक्ल पद्मावती जननी,
मम हृदय बस कमलासिनी।
ध्याऊँ निन्तर भक्त पारस,
नाथ ज्योति प्रकाशिनी।।
तुम जैन शासन दिव्य देवी
सकल मंगल दाय हो,
जिन धर्म धारक जनन को
तुम करती सदा सहाय हो।


त्रिलोक पावन परम तीर्थंकर जू पारस नाथ जी,
उपसर्ग कीना कमठ ने,
तुम्ही निवारा नाथ जी।
उस वक्त भई सहाय तत छिन
हे विजय माता तुम्हीं,
कृपा करो मम दुःख हरो
चरणन पडू हूँ मैं तुम्हीं।
कल्याण भाजन न्यायशीला
प्रगट पर उपकारिणी,
रक्षा करो निज वत्स पर
सब ही के कारज सारिणी
चडी भवानी भूत यक्ष
पिशाच सर्व विनाशनी
ध्याऊँ.....
तुम बुद्धि निर्मल सरद् शशि सम
कीर्ति चंऊ दिशि विस्तरी,
सुमरत निहाल भये भक्तजन
जिनके मन निश्चय धरी।
तुम धवल यश छाओ अनुपम
अंग वत्सल मन धरो,
पर धर्म जन बांधा करे तब
प्रगट होई दुरित हरो।
श्री पात्र केसरी के कर्ण में
कह गई कमलावती,
श्रद्धा करावन जैन लिखि
असलोक फण मंडित सती।
इस भाँति जीव अनेक को
उपकार तुम करती भई,
बारी हमारी आ गई
अब ढ़ील का अवसर नहीं।



पद्मावती स्तोत्र

मूरत का दर्शन देओ माता
जैन की तुम शासनी, ध्याऊँ.
इक बाल ब्रह्मचारी श्री
अकलंक देव परम लसे,
शास्त्रार्थ कीनामास छः
तारा जु देवी घट बसे।
हे मात! तुम्हीं स्वप्न में
प्रत्यक्ष कीन्ह सहायता,
सत विजय पाई जैन धर्म
प्रचार कर सर्वत्रता।
हे अम्बिके वागेश्वरी
कमलेश्वरी पद्मावती,
महिमा कहां लग वाऊँ
तुम विमल ज्योति विराजती।
हे मात! अपनों जानकर
मुझ बाल पे रक्षा करो,
कीजे सफलता कार्य की
शुभ पूर्ण मंगल विस्तरो।
तुम ही को नित रटता रहूँ
प्रत्यक्ष हो जिन शासनी ध्याऊँ,
जब सेठ गुणधर को परो
संकट महा दरिद्र तनो,
तुम्ही ने तीन लक्ष दई अतुल
अरूदंत रत्न जड़ित घणो।
पाषाण पारस के भिड़ेते
लोह कंचन होते हैं,
मेरे हृदय दोनों विराजत
क्यों न हो उद्योत है।
सुगुण धरणी सुख करनी
आयो शरण तुमरी हे माँ,
प्रतिपाल कर मम दुःख हरो
मुझ देऊ वर माता रमा।
तुमरो करूँ सिमरण सदा
आशा लगी तुम दर्श की,
रोमावली प्रफुल्लित भई है
वार आई हर्ष की।
कृपा हजारो पे करो
पारस प्रभु की दासिनी, ध्याऊँ......

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