Bhaktamar Stotra Shloka-14 With Meaning

Abhishek Jain
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 Bhaktamar Stotra Shloka-14 With Meaning

भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का महान प्रभावशाली स्तोत्र है । इस स्तोत्र की रचना आचार्य मानतुंग ने की थी । इस स्तोत्र की रचना संस्कृत भाषा में हुई थी , जो इस स्तोत्र की मूल भाषा है, परन्तु यदी आपको संस्कृत नही आती तो आपकी सुविधा के लिए Bhaktamar Stotra के श्र्लोको (Shloka) को हमने मूल अर्थ के साथ - साथ हिन्दी में अनुवादित करते हुये उसका अर्थ भी दिया है , साथ हि साथ जिन लोगो को English आती है और संस्कृत नही पढ सकते वह सधार्मिक बंधु भी English मे Bhaktamar stotra का पाठ कर सकते है । इस प्रकार से Bhaktamar Stotra Shloka-14 With Meaning की सहायता से आप आसानी से इस स्तोत्र का पाठ कर सकते है ।

चाहे भाषा कोई भी हो हमारी वाणी से श्री आदीनाथ प्रभु का गुणगाण होना चाहिए । नित्य प्रातः काल मे पूर्ण शुद्धता के साथ श्री भक्तामर स्तोत्र का पाठ अवश्य करें ।

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Bhaktamar Stotra Shloka-14

Bhaktamar Stotra Shloka - 14

आधि-व्याधि-नाशक लक्ष्मी-प्रदायक

(In Sanskrit)

सम्पूर्ण-मण्डल-शशांक-कला कलाप-

शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लंग्घयंति ।

ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वर-नाथमेकं,

कस्तान्निवारयति संचरतो यथेष्टम ॥14॥

(In English)

sampurnamannala - shashankakalakalap

shubhra gunastribhuvanam tava langhayanti |

ye sanshritas -trijagadishvara nathamekam

kastan -nivarayati sancharato yatheshtam || 14 ||

Explanation (English)

O Master of the three worlds! Your innumerable virtues 

are radiating throughout the universe-even beyond the 

three worlds, surpassing the glow of the full moon; the 

hymns in praise of your virtues can be heard everywhere 

throughout the universe. Indeed, who can contain the 

movement of devotees of the only supreme Godhead like 

you?

(हिन्दी में )

पूरन-चंद्र-ज्योति छविवंत, तुम गुन तीन जगत् लंघंत |

एक नाथ त्रिभुवन-आधार, तिन विचरत को करे निवार ||१४||

(भक्तामर स्तोत्र के चौदहवे श्लोक का अर्थ )

पूर्ण चन्द्र की कलाओं के समान उज्ज्वल आपके गुण, तीनों लोको में व्याप्त हैं क्योंकि जो अद्वितीय त्रिजगत् के भी नाथ के आश्रित हैं उन्हें इच्छानुसार घुमते हुए कौन रोक सकता हैं? कोई नहीं ।


" भगवान ऋषभदेव जी की जय "


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