Bhaktamar Stotra Shloka-34 With Meaning

Abhishek Jain
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Bhaktamar Stotra Shloka-34 With Meaning 

भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का महान प्रभावशाली स्तोत्र है । इस स्तोत्र की रचना आचार्य मानतुंग ने की थी । इस स्तोत्र की रचना संस्कृत भाषा में हुई थी , जो इस स्तोत्र की मूल भाषा है, परन्तु यदी आपको संस्कृत नही आती तो आपकी सुविधा के लिए Bhaktamar Stotra के श्र्लोको (Shloka) को हमने मूल अर्थ के साथ - साथ हिन्दी में अनुवादित करते हुये उसका अर्थ भी दिया है , साथ हि साथ जिन लोगो को English आती है और संस्कृत नही पढ सकते वह सधार्मिक बंधु भी English मे Bhaktamar stotra का पाठ कर सकते है । इस प्रकार से Bhaktamar Stotra Shloka-34 With Meaning की सहायता से आप आसानी से इस स्तोत्र का पाठ कर सकते है ।

चाहे भाषा कोई भी हो हमारी वाणी से श्री आदीनाथ प्रभु का गुणगाण होना चाहिए । नित्य प्रातः काल मे पूर्ण शुद्धता के साथ श्री भक्तामर स्तोत्र का पाठ अवश्य करें ।

Bhaktamar Stotra Shloka-34

Bhaktamar Stotra Shloka - 34

गर्व रक्षक

(In Sanskrit)

शुम्भत्प्रभा-वलय-भूरि-विभा विभोस्ते,

लोकत्रये द्युतिमतां द्युतिमा-क्षिपंती ।

प्रोद्यद्दिवाकर्-निरंतर-भूरि-संख्या,

दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोम-सौम्याम् ॥34॥

(In English)

shumbhatprabhavalaya - bhurivibha vibhoste,

lokatraye dyutimatam dyutimakshipanti |

prodyad -divakara - nirantara bhurisankhya

diptya jayatyapi nishamapi soma-saumyam || 34 ||

Explanation (English)

O Lord ! The resplendent orb around you is more 

magnificent than any other luminous object in the 

universe. It quells the darkness of the night and is 

brighter than many suns put together; yet it is as cool 

and serene as the bright full moon.

(हिन्दी में )

तुम तन-भामंडल जिन-चंद, सब दुतिवंत करत हैं मंद |

कोटि संख्य रवि-तेज छिपाय, शशि निर्मल निशि करे अछाय ||३४||

(भक्तामर स्तोत्र के 34 वें श्लोक का अर्थ )

हे प्रभो! तीनों लोकों के कान्तिमान पदार्थों की प्रभा को तिरस्कृत करती हुई आपके मनोहर भामण्डल की विशाल कान्ति एक साथ उगते हुए अनेक सूर्यों की कान्ति से युक्त होकर भी चन्द्रमा से शोभित रात्रि को भी जीत रही है|


" भगवान ऋषभदेव जी की जय "

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