Bhaktamar Stotra Shloka-45 With Meaning

Abhishek Jain
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  Bhaktamar Stotra Shloka-45 With Meaning

भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का महान प्रभावशाली स्तोत्र है । इस स्तोत्र की रचना आचार्य मानतुंग ने की थी । इस स्तोत्र की रचना संस्कृत भाषा में हुई थी , जो इस स्तोत्र की मूल भाषा है, परन्तु यदी आपको संस्कृत नही आती तो आपकी सुविधा के लिए Bhaktamar Stotra के श्र्लोको (Shloka) को हमने मूल अर्थ के साथ - साथ हिन्दी में अनुवादित करते हुये उसका अर्थ भी दिया है , साथ हि साथ जिन लोगो को English आती है और संस्कृत नही पढ सकते वह सधार्मिक बंधु भी English मे Bhaktamar stotra का पाठ कर सकते है । इस प्रकार से Bhaktamar Stotra Shloka-45 With Meaning की सहायता से आप आसानी से इस स्तोत्र का पाठ कर सकते है ।

चाहे भाषा कोई भी हो हमारी वाणी से श्री आदीनाथ प्रभु का गुणगाण होना चाहिए । नित्य प्रातः काल मे पूर्ण शुद्धता के साथ श्री भक्तामर स्तोत्र का पाठ अवश्य करें ।

Bhaktamar Stotra Shloka-45

Bhaktamar Stotra Shloka - 45

सर्व भयानक रोग नाशक

(In Sanskrit)

उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्नाः,

शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशाः ।

त्वत्पाद-पंकज-रजोमृतदिग्ध-देहाः,

मर्त्या भवंति मकर-ध्वज-तुल्य-रूपाः ॥45॥

(In English)

ud bhutabhishanajalodara - bharabhugnah

shochyam dashamupagatashchyutajivitashah |

tvatpadapankaja-rajoamritadigdhadeha,

martya bhavanti makaradhvajatulyarupah || 45 ||

Explanation (English)

O the all knowledgeable one ! An extremely sick person, 

deformed due to dropsy and maladies incurable, having 

lost all hopes of recovery and survival, when he rubs 

the nectar-like dust taken from your feet, fully 

recovers and takes form like cupid sweet.

(हिन्दी में )

महा जलोदर रोग-भार पीड़ित नर जे हैं |

वात पित्त कफ कुष्ट आदि जो रोग गहे हैं ||

सोचत रहें उदास नाहिं जीवन की आशा |

अति घिनावनी देह धरें दुर्गंधि-निवासा ||

तुम पद-पंकज-धूल को, जो लावें निज-अंग |

ते नीरोग शरीर लहि, छिन में होंय अनंग ||४५||

(भक्तामर स्तोत्र के 45 वें श्लोक का अर्थ )

उत्पन्न हुए भीषण जलोदर रोग के भार से झुके हुए, शोभनीय अवस्था को प्राप्त और नहीं रही है जीवन की आशा जिनके, ऐसे मनुष्य आपके चरण कमलों की रज रुप अम्रत से लिप्त शरीर होते हुए कामदेव के समान रुप वाले हो जाते हैं|


" भगवान ऋषभदेव जी की जय "


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