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वासुपूज्य जी

भगवान वासुपूज्य जी जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर थे । भगवान वासुपूज्य का जन्म चम्पापुरी के राजपरिवार में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन हुआ था। इनके पिता का नाम वासुपुज्य राजा और माता का नाम जयावती था।

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भगवान वासुपूज्य के पाँचो कल्याणक चम्पापुरी में ही हुये थे ।
प्रभु की देह का रंग लाल था और प्रभु का प्रतीक चिह्न भैंसा था । प्रभु के शरीर की ऊंचाई 70 धनुष (210 मीटर) थी । भगवान वासुपूज्य जी की आयु 72 लाख वर्ष थी ।

प्रभु वासुपूज्य जी का जन्म इक्ष्वाकु कुल में हुआ था । फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रभु ने चम्पापुरी में दीक्षा ग्रहण की और दीक्षा ग्रहण करते ही प्रभु चार ज्ञान से युक्त हो गये । प्रभु को मती ज्ञान ,श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान और मन:पर्व ज्ञान हो गये । 

प्रत्येक तीर्थंकर प्रभु जन्म के समय से ही तीन ज्ञान युक्त होते है , दीक्षा के समय उन्हे केवल मनः पर्व ज्ञान होता है । तीर्थंकर प्रभु की साधना कैवलय ज्ञान के लिए ही होती है ।

प्रभु वासुपूज्य जी का साधना काल 1 वर्ष तक जारी रहा , 1 वर्ष पश्चात माघ शुक्ल द्वितिया को प्रभु को कैवलय ज्ञान की प्राप्ती हुई । कैवलय ज्ञान की प्राप्ती के साथ ही प्रभु ने अपने चार घनघाती कर्मो का क्षय कर अरिहंत कहलाये , इसके पश्चात् प्रभु ने चार तीर्थो की स्थापना कर तीर्थंकर कहलाये ।

प्रभु के संघ में 66 गणधर थे । प्रभु के यक्ष का नाम षण्मुख तथा यक्षिणी का नाम गांधारी था । 
प्रभु वासुपूज्य ने सत्य और अहिंसा का उपदेश दिया ।
इसके पश्चात भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी के दिन प्रभु ने निर्वाण प्राप्त किया और अष्ट कर्मो का क्षय कर सिद्ध कहलाये ।


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" जय जिनेन्द्र ".


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