राजा मेघरथ की कथा - जैन कहानी

बहुत पुराने जमाने की बात है । मेघरथ नामक एक राजा बड़ा ही दयालु था । वह किसी भी प्राणी को दुःखी देखता तो उसका हृदय दया से भर आता था । अपने प्राणों की भी परवाह न कर दूसरे प्राणियों की रक्षा करना वह अपना धर्म समझता था । इसलिये उसका यश इस लोक में ही नहीं, स्वर्गलोक में भी पहुंच गया था ।

एक दिन स्वर्ग के राजा इन्द्र ने भी अपनी सभा में राजा मेघरथ का गुणगान किया, जिसे सुन कर दो देवताओं ने राजा की परीक्षा करनी चाही । उनमें से एक कबूतर बना और दूसरा बहेलिया । कबूतर उड़ता हुआ राजा की गोद में आकर बैठ गया । वह भय के मारे कांप रहा था । राजा ने उस पर हाथ फेरते हुए कहा डर मत, अब तुझे कोई नहीं मार सकेगा।


इतने ही में बहेलिया बना हुआ देव भी वहां आ पहुंचा और राजा से कहने लगा-यह कबूतर मेरा है। देखो, यह मेरा बाज पक्षी भी भूखा है । मैं इसी के लिए इसे पकड़ता था । आप इसे लौटा दीजिए।

राजा मेघरथ जैन कहानी

राजा ने कहा-भाई, अब तो यह मेरी शरण में आ गया है । इसकी रक्षा करना मेरा धर्म है । अब मैं तुम्हें यह कैसे दे सकता हूं ? इसके बदले में तुम चाहो तो दूसरी कोई वस्तु मांग सकते हो । बहेलिया बोला-महाराज, यह अन्याय है। मेरी चीज मुझे मिलनी चाहिये । अगर यह कबूतर आप नहीं दे सकते तो किसी दूसरे प्राणी का कबूतर जितना ताजा मांस दिला दीजिये।

राजा ने कहा-यह कैसे हो सकता है ? इस कबूतर को बचाऊ और दूसरे किसी पंचेन्द्रिय जीव को मारू? और कुछ चाहते हो तो ले लो । दूसरे जीव को मार कर मैं तुम्हें मांस नहीं दे सकता । दूसरे जीव को मारना तो सबसे बड़ा पाप है । अगर तुम्हें मांस हो लेना है तो मैं तुम्हें अपना मांस दे सकता हूं।

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बहेलिये ने कहा-महाराज, आप क्या कह रह हैं ? कबूतर के बदले आप अपना मांस देना चाह रहे है ? तनिक सोच-विचार कर काम कीजिये । कहीं ऐसा न हो कि एक साधारण प्राणी के पीछे आप आपना अहित कर बैठे।

राजा ने कहा-शरण में आये हुए की रक्षा करना मेरा धर्म है । अपने धर्म का पालन करने में विलम्ब नहीं होना चाहिये । राजा ने तत्क्षण एक बड़ा तराजू मंगाया । तराजू के एक पलड़े में कबूतर और दूसरे पलड़े में वह अपना मांस काट-काट कर रखने लगा । राजा ने अपने सारे शरीर का मांस काट कर पलड़े में रख दिया परन्तु वह कबूतर के बराबर नहीं हुआ । देव-माया से कबूतर का पलड़ा भारी ही बना रहा । राजा मेघरथ भी पीछे हटने वाले वीर नहीं थे। जब उन्होंने देखा कि मांस वाला पलड़ा झुकता नहीं है तो स्वयं उठकर तराजू में जा बैठे ।


बस, फिर क्या था ? देवताओं की परीक्षा पूरी हुई। आकाश से पुष्प-वर्षा होने लगी और जय-जयकार से वायु मंडल गूज उठा । कबूतर और बहेलिया देव-रूप में प्रकट हुए और राजा की प्रशंसा करते हुए क्षमा मांगने लगे । राजा का शरीर भी पहले की तरह पूर्ण स्वस्थ हो गया ।

जैनधर्म का पहला व्रत अहिंसा है इसका पालन मेघरथ राजा ने किया तो आगे चलकर यही जैनधर्म के 16वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी हुए । दया का फल कितना महान् है ! दया के प्रभाव से तीर्थकर जैसा महान पद मिलता है, जिनके चरणों में स्वर्ग के इन्द्र भी मस्तक झुकाते हैं।

राजा मेघरथ का यह त्याग हमें हमेशा जीव रक्षा का संदेश देता है, अहिंसा ही परम धर्म है

" भगवान शांतीनाथ की जय हो "


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" जय जिनेन्द्र "

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