पैंसठिया यंत्र के अन्तर्गत तीर्थंकर-स्तुति

तीर्थंकर महाप्रभु की स्तुती से सुखद कुछ भी नही हो सकता , यह परम सौभाग्य कि बात हैं की हम प्रभु को नमस्कार कर उन्के अहिंसा के मार्ग पर चले , एक तीर्थंकर महाप्रभु की स्तुती का सौभाग्य परम होता है ,यदि एक साथ चौबीस तीर्थंकर महाप्रभु की स्तुती की तो कल्पना भी आन्नददायक है , पैंसठिया यंत्र के अन्तर्गत तीर्थंकर-स्तुति से हम एक साथ चौबीस (24) तीर्थंकर प्रभु को नमस्कार करते है । अतः अपने जीवन में प्रतिदिन 2 मिनट निकालकर इस स्तुती से प्रभु को नमस्कार अवश्य करें ।


तीर्थंकर-स्तुति

पैंसठिया यंत्र के अन्तर्गत तीर्थंकर-स्तुति

चौबीस जिनेश प्रणमु हमेश
अघ-अशिव-क्लेश-भवभयहरणम्
जपो जय जिनंद, वरते आनन्द
सुखशांतिवृन्द, मंगलकरणम् ॥ ध्रु०॥

शिवादेवी-नंद आनन्द कन्द
नेमिजिनंद संभवस्वामी।
सुविधिकृपाल धन धर्मपाल
शांतिदयाल अन्तर्यामी।
ज्ञानी अनंत मुनिसुव्रत कंत
नमि जग-महंत धारे शरणम् । जपो जय१॥

अरह अजित जीत, शशिप्रभु पुनीत
श्री ऋषभउदित कुल-धर्मपति ।
स्वामि सुपार्श्व मुझ पुरो आश
बुद्धि प्रकाश करो विमल मति ।
मल्ली से मल्ल, अरि से अटल्ल
तन धनुष पच्चीस हरितवरणम् । जपो जय २।।

अरनाथ धीर, महावीर वीर
हरो सकल पीर दो सुखसाता ।
सुमति की आश दो सुमति नाथ
नमि जोडुं हाथ, मांगू दाता ।
भज पद्म कम, सब छोड़ छद्म
दो मोक्ष सद्म, टालो मरणम् । जपो जय ३।।

बासुपूज्य जाप, शीतल प्रताप
हरो विषयताप, कर दो शीतल ।
श्रेयांसदेव, सब करत सेव
कुंथु कुटेव, कर दूर सकल ।
पारसदयाल, करिए निहाल
अभिनन्दन जिन तारण-तरणम् । जपो जय ४।।

मंत्रों में मंत्र, पैंसठिया यंत्र
तंत्रों में तंत्र सब काज सरे ।
तंत्रों में तंत्र नित ध्यान धरे ।
करे सकल सिद्धि, यश ऋद्धि वृद्धि
वांछित समृद्धि भंडार भरे ।
कहे अमिरिख परचो प्रत्यक्ष
गुरुदेव सीख हिरदे धरणम् । जपो जय ५।।


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" जय जिनेन्द्र "

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