Bhaktamar Stotra Shloka-18 With Meaning

Abhishek Jain
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 Bhaktamar Stotra Shloka-18 With Meaning

भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का महान प्रभावशाली स्तोत्र है । इस स्तोत्र की रचना आचार्य मानतुंग ने की थी । इस स्तोत्र की रचना संस्कृत भाषा में हुई थी , जो इस स्तोत्र की मूल भाषा है, परन्तु यदी आपको संस्कृत नही आती तो आपकी सुविधा के लिए Bhaktamar Stotra के श्र्लोको (Shloka) को हमने मूल अर्थ के साथ - साथ हिन्दी में अनुवादित करते हुये उसका अर्थ भी दिया है , साथ हि साथ जिन लोगो को English आती है और संस्कृत नही पढ सकते वह सधार्मिक बंधु भी English मे Bhaktamar stotra का पाठ कर सकते है । इस प्रकार से Bhaktamar Stotra Shloka-18 With Meaning की सहायता से आप आसानी से इस स्तोत्र का पाठ कर सकते है ।

चाहे भाषा कोई भी हो हमारी वाणी से श्री आदीनाथ प्रभु का गुणगाण होना चाहिए । नित्य प्रातः काल मे पूर्ण शुद्धता के साथ श्री भक्तामर स्तोत्र का पाठ अवश्य करें ।

Bhaktamar Stotra Shloka-18

Bhaktamar Stotra Shloka - 18

शत्रु सेना स्तम्भक

(In Sanskrit)

नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं।

गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम् ।

विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्प-कांति,

विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशांक-विम्बम् ॥18॥

(In English)

nityodayam dalitamohamahandhakaram

gamyam na rahuvadanasya na varidanam |

vibhrajate tava mukhabjamanalpa kanti

vidyotayajjagadapurva - shashankabimbam || 18 ||

Explanation (English)

O Master! Your beautiful face transcends the moon. The 

moon shines only at night but your face is always 

beaming. The moon light dispels darkness only to a some 

level, your face dispels the delusion of ignorance and 

desire. The moon is eclipsed as well as obscured by 

clouds, but there is nothing that can shadow your face.

(हिन्दी में )

सदा उदित विदलित तममोह, विघटित मेघ-राहु-अवरोह |

तुम मुख-कमल अपूरब चंद, जगत्-विकाशी जोति अमंद ||१८||

(भक्तामर स्तोत्र के 18 वें श्लोक का अर्थ )

हमेशा उदित रहने वाला, मोहरुपी अंधकार को नष्ट करने वाला जिसे न तो राहु ग्रस सकता है, न ही मेघ आच्छादित कर सकते हैं, अत्यधिक कान्तिमान, जगत को प्रकाशित करने वाला आपका मुखकमल रुप अपूर्व चन्द्रमण्डल शोभित होता है |


" भगवान ऋषभदेव जी की जय "


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