श्री दीपावली का स्तवन ( जैन धर्म )

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श्री दीपावली के स्तवन का पाठ दीपावली के दिन पूजन में जरूर करना चाहिए । दीपावली जैन धर्म का प्रमुख त्यौहार है (Jain dharm me dipawali), जैन लोग इस दिन को भगवान महावीर निर्वाण दिवस के रूप में मनाते है ।

जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर का निर्वाण दीपावली के दिन हुआ था तभी देवताओ ने चारो दिशा में दीपामाला कर प्रभु का निर्वाण महोत्सव मनाया था । दीपावली के अगले दिन गौतम स्वामी जी को केवलय ज्ञान की प्राप्ती हुई थी । अतः दीपावली वीर निर्वाण संवत का प्रारम्भं था

जैन धर्म का नववर्ष दीपावली के अगले दिन से प्रारम्भ होता है । श्री दीपावली का स्तवन का पाठ पूजन में अवश्य करना चाहिए ।

भगवान महावीर निर्वाण दिवस

श्री दीपावली का स्तवन

पूरब दिशे हुई पावा पुरी 
धन धान्य ऋद्धि समृद्धि भरी।
हस्तीपाल नामे तिहाँ भूपाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ १ ॥
गौतमे गुरुनी सेवा कीधी मनआनी,
एक रात में हुआ केवलज्ञानी ।
जी के चौदह राजु रह्या भाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ २ ॥
अठारे राय हुआ भगता,
दोय दोय पोसा कीधा लगता,
जीके वीर सामु रह्या निहाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ ३ ॥
प्रभुए दोय दिनरो संथारो कीधो,
सोल पहोर लगे उपदेश दीधो ।
प्रभु मुक्ति गया कर्माने गाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ ४ ॥
प्रभुजी तीस वर्ष संयम लीधो,
निज आतम कारज सिध कीधो ।
वर्ष बियालीस दीक्षा पाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ ५ ॥
प्रभु ने सात - सौ चेला चौदह-सौ चेली,
ज्यांने मुक्ति महलमा दिया मेली ।
जेणे कर्मना बीज दिया बाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ ६ ॥
प्रभु ने एक राणी ने हुई एक बेटी,
जीके मुक्ति गया दुख दिया मेटी ।
जमाई हुओ ज्याँरो जमाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ ७ ॥
प्रभु ने एक बहन ने एकज भाई,
जीके स्वर्ग गया समकित पाई ।
श्रावकना व्रत शुद्ध पाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ ८ ॥
ऋषभदत्त ने देवानन्दा माता,
नयणे निरखंता हुई साता ।
दोनुं मुक्ति गया कर्मांने गाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ ६ ॥
सिद्धारथ राजा ने त्रिशला राणी,
जेणे संथारो कीधो समता आणी,
अच्युत देवलोके टांको दियो झाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥१०॥
जेणी राते वीरे मुक्ति पानी,
केवल पाम्या गौतम स्वामी,
ज्यारो जाप जपो नव करवाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥११॥
सुधर्मा स्वामी हुआ पाट धणी,
ज्यांरी कीर्ति महिमा जोर घणी ।
दयामारग दीयो अजवाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥१२॥
ज्यारे पाटे हुआ जंबू वैरागी,
राते परण्या प्रभाते आठों त्यागी ।
सोल वर्ष में काटी कर्म जाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥१३॥
आठे भामिनी वैराग्ये भीनी,
प्रभाते पियु साथे दीक्षा लीनी,
अबीहड़ प्रीति सघली पाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ १४ ॥
प्रभवो पण राजानो बेटो,
जीके जंबूकुँवर से हुओ भेटो ।
पांच - सौ से वैराग्य पाम्यो तत्काली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥१५॥
बीस जिन समेत शिखर सीझ्या,
अष्टापद गिस्तार दोय सीझ्या ।
वासुपूज्य सीझ्या चंपा चाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥१६॥
महावीरे चौमास कीधो पावापुरी,
कारतक वदी अमावस मुक्ति वरी।
भणतां सुणता मंगल माली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥१७॥
दिन दीवालीनो पायो टाणो,
तो रात्रि-भोजन अशनादि नहिं खाणो ।
ज्यारो जाप जपो शीयल पाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ १८ ॥
गुरु चेलानी जोड़ी सूरज शशी,
ऋषि रायचन्द कहे म्हारे मनड़े वशी ।
में जुगतीशुं जोड़ी जोड़ टकशाली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली
पूज्य जयमलजी रहिया पासो,
शहर नागौर में कियो चौमासो ।
संवत अठारा वर्ष पीस्ताली,
वीर मुक्ति विराज्या दिन दिवाली ॥ २० ॥

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