सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पोस्ट

दिसंबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Featured Post

जैन धर्म में तीर्थंकर क्या होते हैं ?

जैन धर्म में तीर्थंकर अरिहंत भगवान होते हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है तीर्थ की स्थापना करने वाला ।
जैन धर्म में साधु , साध्वी, श्रावक, श्राविका ये चार तीर्थ की स्थापना करने के कारण तीर्थंकर कहलाते है । जब प्रभु कैवलय ज्ञान प्राप्त करते है तब वह सर्वज्ञ हो जाते है, वे अपने चार घनघाती कर्मो का क्षय कर अरिहंत कहलाते है ।
उसके पश्चात वह धर्म की स्थापना के लिए उपदेश देते है ।  प्रभु द्वारा प्रतिपादित धर्म में जो गृहत्याग कर कठोर धर्म के पालन का प्रण लेता है तो वह पुरूष साधु तथा महिला साध्वी कहलाती है । इसी प्रकार जो गृहस्थ धर्म में रहकर हि मध्यम प्रकार से धर्म का मार्ग चुनता है तो जिन का वह अनुयायी अगर पुरुष है तो श्रावक और स्त्री है तो श्राविका कहलाती है । इस प्रकार से तीर्थंकर महाप्रभु दो प्रकार के धर्म का प्रतिपादन करते है। 1. साधु धर्म 2. श्रावक धर्म इस प्रकार इन तीर्थ कि स्थापना करने के कारण वह तीर्थंकर कहलाते है । तीर्थ अर्थात्‌ स्वयं तरने में समर्थ । जब तीर्थंकर महाप्रभु अपने समस्त कर्मो का क्षय कर लेते है तो वह निवार्ण को प्राप्त होते है अर्थात् सिद्ध भगवान कहलाते है । उदाहरण - वर्…

जैन धर्म में बलदेव

जैन धर्म में बलदेव कि संख्या 9 होती है, ये धर्मात्मा होते है , तथा हमेशा देव लोक या मोक्ष हि पधारते है, अति पुण्य आत्मा बलदेव का पद धारण करती है। बलदेव वासुदेव के भाई होते है , जो यहाँ बलदेव कि साह्यता के लिए होते है । एक काल में वासुदेव, प्रति वासुदेव और बलदेव होते है । इस प्रकार से एक बार में तीन महान विभूती होने से 27 महान पुरूष एक काल क्रम में होते है। यहाँ बलदेव व वासुदेव धर्म के अवतार कहे जाते है, और प्रतिवासुदेव प्रतिनायक के रूप में होता है । वासुदेव , प्रति वासुदेव का चक्र रत्न से अंत कर धर्म कि स्थापना करते है। यहा बलदेव साहयक के रूप में होता है । बलदेव धर्म कि प्रतिमूर्ती कहे जाते है।
जैन धर्म में 9 बलदेव का उल्लेख है - :
1. विजय जी
2. अचल जी
3. भद्रा जी
4. सुप्रभ जी
5. सुदर्शन जी
6. नन्दीसेन जी
7. नन्दीमित्र जी
8. राम जी
9. बलराम जी


अगर कोई गलती हो तो "मिच्छामी दुक्कड़म" ।

जैन धर्म में प्रतिवासुदेव

जैन धर्म में प्रतिवासुदेवो कि संख्या 9 होती है, ये 63 उत्कृष्ट श्लाकापुरूष में गिने जाते है, ये प्रतिनायक होते है , प्रत्येक प्रति वसुदेव अपने काल के धर्मनिष्ठ वासुदेव के हाथों मारा जाता है।
फिर भी प्रति वासुदेवो कि कुछ विशिष्टता होती है, जिस कारण से ये पहचाने जाते है।
प्रतिवासुदेवो कि संख्या 9 होती है-: 1.अश्वग्रीव जी

2. तारक जी

3. मेरक जी

4. मधु कैटभ जी

5. निशुम्भ जी

6. बलि जी

7. प्रहलाद जी

8. रावण जी

9. जरासंध जी



अगर कोई गलती हो तो "मिच्छामी दुक्कड़म" ।

why do jain monks cover their mouths ?

जैन साधु मुँह पर पट्टी क्यो बाँधते है ? जैन धर्म का प्रमुख सिद्धांत अहिंसा है , और एक जैन मुनी जब दीक्षा ग्रहण करता है तब वह सभी प्रकार के जीवो कि हिंसा का त्याग करता है। जहाँ तक संभव हो सके वह जीव -जंतुओ कि सहायता करते है, इस प्रकार से वायु मे पनप ने वाले छोटे जीवो कि रक्षा के लिए जैन साधु-साध्वी मुँह पर पट्टी बाँधते है, प्राकृत भाषा मे इन्हे बादर - वायुकाय कहा जाता है। जैन मुनी न दिखने वाले जीवों के प्रती भी दया भाव रखते है , आज से सैकडो वर्ष पहले जब लोगो को सूक्ष्म जीवो का ज्ञान नही था तब भी जैन मुनी मुँह पर पट्टी लगाते थे ।  दुसरा इसका प्रमुख कारण है कि जब कभी जैन मुनी शास्त्र कि वाचना करते है , तब उनके मुंह से सूक्ष्म मात्रा में भी थूक का अंश पवित्र पुस्तक पर नही पडता ऐसा करके वह शास्त्र के प्रति सम्मान व्यक्त करते है।अहिंसा व जीव दया ,पंचमहाव्रती , 3 गुप्तीयो को धारण करने के कारण जैन मुनी मुहँ पर पट्टी धारण करते है।

जैन धर्म में वासुदेव

जैन धर्म में वासुदेव कि संख्या 9 है, जैन धर्म में वासुदेव धर्म के रक्षक माने जाते है, जो प्रति वासुदेवो का वध कर, धर्म कि स्थापना करते है, ये पृथ्वी के 6 खण्डो में से 3 के स्वामी होते है , इनका राज्य विशाल होता है, वासुदेव बलशाली व रिद्धी सम्मपदा युक्त होते है,
जैन धर्म के 9 वासुदेवो के नाम निम्नलिखित है-:
1.श्री त्रिपुष्ठ कुमार जी

2. श्री द्विपृष्ठ कुमार जी

3.श्री श्री स्वयंभू जी

4. श्री पुरुषोत्तम जी

5. श्री पुरुषसिंह जी

6. श्री पुरुषपुंडरीक जी

7. श्री पुरुषदत्त जी

8. श्री लक्ष्मण जी

9. श्री कृष्ण जी

विहरमान-तीर्थकर

जैन धर्म में विहरमान तीर्थंकर कि संख्या 20 मानी गई है। ये वर्तमान अरिहंत है, जब भी हम नवकार महामंत्र बोलते है, तब हम सबसे पहले इन्ही विरहमान तीर्थंकरो को नमस्कार करते है।
जब हम कहते है,णमो अरिहंताणं तब हम अरिहंत भगवान को नमस्कार करते है, क्योकि भगवान महावीर तो निवार्ण प्राप्त कर सिद्ध हो गये है, और वह णमो सिद्धाणं में ध्याये जाते है।
विहरमान का अर्थ होता है विराजमान अर्थात्‌ जो वर्तमान में मौजूद है, जैन धर्म के 20 विहरमान तीर्थंकर इस समय महाविदेह क्षेत्र में विचरण कर रहे है, सीमंधर स्वामी जी इस महाविदेह क्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर है। जब भी हम कोई उपवास करते है, तब हम . श्री सिंमधर स्वामी जी कि आज्ञा लेते है, क्यो? क्योकि वह अरिहंत भगवान है, जो इस समय है क्योकि इस संसार में धर्म का लोप कभी भी नही होता ।
जैन धर्म के 20 विहरमान तीर्थंकरो के नाम -: 1. श्री सिंमधर स्वामी जी

2. श्री युगमंदिर स्वामी जी
3. श्री बाहु स्वामी जी
4. श्री सुबाहु स्वामी जी
5. श्री सुजात स्वामी जी
6. श्री स्वयंप्रभ स्वामी जी
7. श्री ऋषभभानन स्वामी जी
8. श्री अनंतवीर्य स्वामी जी
9. श्री सुरप्रभ स्वामी जी
10. श्री वज्…

जैन धर्म की 16 महासतिया

जैन धर्म मे अनेको ऐसी नारियो का उल्लेख है, जिन्होने अपने शील व धर्म के बल पर अनेको दृष्टो को पराजित कर दिया और धर्म कि स्थापना कि ऐसी धर्मनिष्ठ 16 महासतियो का उल्लेख जैन धर्म में किया गया है ।


जैन धर्म कि 16 महासतियो के नाम निम्नलिखत हैं -:

1.ब्राह्मी जी

2.सुन्दरी जी

3.चंदनबाला जी

4.राजिमती जी

5.द्रोपदी जी

6.कौशल्या जी

7.मृगावती जी

8.सुलसा जी

9.सीता जी

10.सुभद्रा जी

11.शिवा सती जी

12.कुंती जी

13.शीलवती जी

14.दमयंती जी

15 .पुष्पचुला जी

16.प्रभावती जी

मेरी भावना

जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया,
बुद्ध, वीर जिन, हरि, हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो
भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो। ॥१॥
विषयों की आशा नहीं जिनके, साम्य भाव धन रखते हैं
निज-पर के हित साधन में जो निशदिन तत्पर रहते हैं,
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं
ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुःख-समूह को हरते हैं। ॥२॥
रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे
उन ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे,
नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूँ
पर-धन-वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ। ॥३॥
अहंकार का भाव न रखूँ, नहीं किसी पर खेद करूँ
देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईर्ष्या-भाव धरूँ,
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूँ
बने जहाँ तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ। ॥४॥
मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे
दीन-दु:खी जीवों पर मेरे उरसे करुणा स्रोत बहे,
दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे
साम्यभाव रखूँ मैं उन पर ऐसी परिणति हो जावे। ॥५॥ गुणीजनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे
बने जहाँ तक …

कल्याण मंदिर स्तोत्र : हिन्दी

कल्याण मंदिर स्तोत्र : हिन्दी




परम-ज्योति परमात्मा, परम-ज्ञान परवीन |

वंदूँ परमानंदमय घट-घट-अंतर-लीन ||१||


निर्भयकरन परम-परधान, भव-समुद्र-जल-तारन-यान |
शिव-मंदिर अघ-हरन अनिंद, वंदूं पार्श्व-चरण-अरविंद ||२||

कमठ-मान-भंजन वर-वीर, गरिमा-सागर गुण-गंभीर |
सुर-गुरु पार लहें नहिं जास, मैं अजान जापूँ जस तास ||३||

प्रभु-स्वरूप अति-अगम अथाह, क्यों हम-सेती होय निवाह |
ज्यों दिन अंध उल्लू को होत, कहि न सके रवि-किरण-उद्योत ||४||

मोह-हीन जाने मनमाँहिं, तो हु न तुम गुन वरने जाहिं |
प्रलय-पयोधि करे जल गौन, प्रगटहिं रतन गिने तिहिं कौन ||५||

तुम असंख्य निर्मल गुणखान, मैं मतिहीन कहूँ निज बान|
ज्यों बालक निज बाँह पसार, सागर परमित कहे विचार ||६||

जे जोगीन्द्र करहिं तप-खेद, तेऊ न जानहिं तुम गुनभेद |
भक्तिभाव मुझ मन अभिलाष, ज्यों पंछी बोले निज भाष ||७||

तुम जस-महिमा अगम अपार, नाम एक त्रिभुवन-आधार |
आवे पवन पदमसर होय, ग्रीषम-तपन निवारे सोय ||८||

तुम आवत भवि-जन मनमाँहिं, कर्मनि-बन्ध शिथिल ह्वे जाहिं |
ज्यों चंदन-तरु बोलहिं मोर, डरहिं भुजंग भगें चहुँ ओर ||९||

तुम निरखत जन दीनदयाल, संकट तें छूटें तत्काल |
ज्यों प…

भक्तामर स्तोत्र

सर्व विघ्न उपद्रवनाशक भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् ।
सम्यक्प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा-
वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥1॥
शत्रु तथा शिरपीडा नाशक यःसंस्तुतः सकल-वांग्मय-तत्त्वबोधा-
दुद्भूत-बुद्धि-पटुभिः सुरलोक-नाथै ।
स्तोत्रैर्जगत्त्रितय-चित्त-हरै-रुदारैः,
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥2॥
सर्वसिद्धिदायक बुद्धया विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ,
स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोहम् ।
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-
मन्यःक इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥3॥
जलजंतु निरोधक वक्तुं गुणान् गुण-समुद्र! शशांक-कांतान्,
कस्ते क्षमः सुर-गुरु-प्रतिमोपि बुद्धया ।
कल्पांत-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं,
को वा तरीतु-मलमम्बु निधिं भुजाभ्याम् ॥4॥
नेत्ररोग निवारक सोहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश,
कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृतः ।
प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य्य मृगी मृगेन्द्रं,
नाभ्येति किं निज-शिशोः परि-पालनार्थम् ॥5॥
विद्या प्रदायक अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,
त्वद्भक्ति-रेव-मुखरी-कुरुते बलान्माम् ।
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति,
तच्चाम्र-चारु-कालिका-निकरैक-हेतु ॥6॥
सर…

णमोकार मंत्र

णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्व साहूणं एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो मंगला णं च सव्वेसिं, पढमं हवई मंगलं

भगवान महावीर के 11 गणधर

1. इंद्रभुति गौतम

2. अग्निभूति गौतम

3. वायुभूति गौतम

4. व्यक्तस्वामी जी

5. सुधर्मास्वामी जी

6. मंडितपुत्र

7. मौर्यपुत्र

8. अकंपित गौतम

9. अचलभ्राता जी

10. मेतार्यस्वामी जी

11. प्रभासस्वामी

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर

जैन धर्म में 24 तीर्थंकर माने गये है । जिसमें से भगवान ऋषभदेव जी प्रथम तीर्थंकर व भगवान महावीर 24 वें तीर्थंकर है, जैन धर्म में तीर्थंकर एक सर्वोच्च पद होता है , जिस पर अति पुणयशाली आत्मा विराजमान होती है अर्थात्‌ तीर्थंकर बनती है । जैन धर्म में मान्यतानुसार एक अवसर्पनी काल में 24 तथा उत्सर्पिणी काल में 24 तीर्थंकर होते है। इस प्रकार उत्सर्पिणी व अवसर्पनी काल के मिलाकर एक आरा बनता है । एक काल के 6 भाग होते है इस प्रकार दोनो काल के 6-6 भाग मिलाने पर एक आरे का निमार्ण होता है । जैन मान्यतानुसार आज तक अनेको तीर्थंकर जन्म ले चुके है , और आगे भी अनेको तीर्थंकर होगे । पर एक काल मे सिर्फ 24 तीर्थंकर ही होते है । 

वर्तमान काल के 24 तीर्थंकरो के नाम निम्नलिखित है।

1. भगवान ऋषभदेव जी

2. भगवान अजितनाथ जी

3. भगवान संभवनाथ जी

4 भगवान अभिनंदन स्वामी जी

5. भगवान सुमतिनाथ जी

6. भगवान पद्मप्रभु जी

7. भगवान सुपाश्र्ननाथ जी

8. भगवान चंदाप्रभु जी

9. भगवान सुविधनाथ जी

10. भगवान शीतलनाथ जी

11. भगवान श्रेयांसनाथ जी

12. भगवान वासुपूज्य जी

13. भगवान विमलनाथ जी

14. भगवान अनंतनाथ जी

15. भगवान धर्मनाथ जी

16. भगवान शांतीनाथ जी

17.…

भगवान महावीर की साधना

भगवान महावीर की साधना भगवान महावीर की साधना सत्य की साधना थी, यह साधना काल का सफर प्रभु के वर्द्धमान से महावीर बनने का सफर था । प्रभु महावीर के दीक्षा लेने से लेकर प्रभु के ज्ञान प्राप्ती तक की यात्रा में प्रभु को लगभग साढ़े बारह वर्षों का समय लगा । धरती धीर महावीर ने अनेक कष्टो को सहा । प्रभु के साधना काल की प्रमुख घटनाये निम्नलिखत है।
भगवान महावीर की दीक्षा भगवान महावीर ने 30 वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की, दीक्षा के वक्त प्रभु महावीर के पास एकमात्र देवदुष्य वस्त्र था ।

भगवान महावीर द्वारा वस्त्र को त्यागना प्रभु ने 13 माह तक वस्त्र धारण किया उसके पश्चात् प्रभु ने वह वस्त्र सोम शर्मा नामक बाह्मण को दिया था ।
इंद्र की सहायता को अस्वीकार करना दीक्षा के अगले दिन प्रभु ध्यानमगन थे , तभी वहा एक ग्वाला आया और उसने प्रभु को अपने बैल की रक्षा के लिए कहा जब वह लौटा तब वहा उसके बैल नही थे, उसे प्रभु पर क्रोध आया और वह रस्सी लेकर प्रभु को मारने के लिए दौडा तभी वहा इन्द्र देव ने आकर ग्वाले को रोका। इन्द्र देव ने प्रभु कि साहयता कि प्रार्थना कि तो प्रभु ने इसे अस्वीकार कर द…