श्रेयांसनाथ जी

प्रभु श्रेयांसनाथ जी जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर है ।

प्रभु का जन्म फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन सारनाथ में हुआ था । प्रभु के पिता का नाम विष्णु तथा माता का नाम वेणुदेवी था । भगवान इक्ष्वाकु कुल में जन्मे थे तथा उनका प्रतीक चिह्न गेंडा था । भगवान श्रेयांसनाथ ही वह प्रथम तीर्थंकर है , जिनके काल में प्रथम वासुदेव श्री त्रिपुष्ठ कुमार जी , प्रथम बलदेव श्री विजय जी , तथा प्रथम प्रतिवासुदेव अश्वग्रीव हुए ।

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यही प्रथम वासुदेव श्री त्रिपुष्ठ कुमार जी आगे चलकर जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी बने । 

श्रेयांसनाथ जी

प्रभु श्रेयांसनाथ जी की आयु 48,00,000 वर्ष पूर्व थी । प्रभु के शरीर का आकार 80 धनुष (240 मीटर ) था । प्रभु के शरीर का रंग सुनहरा था । 

प्रभु श्रेयांसनाथ ने फाल्गुन कृष्ण एकादशी को दीक्षा ग्रहण की और दीक्षा ग्रहण करते ही प्रभु चार ज्ञान के धारक हो गये । प्रभु का साधनाकाल 2 वर्ष तक चला । दीक्षा ग्रहण के 2 वर्ष पश्चात माघ अमावस्या के दिन प्रभु को कैव्लय ज्ञान की प्राप्ती हुई । प्रभु सर्वज्ञ हो गये , कैव्लय ज्ञान प्राप्त करते ही प्रभु ने अरिहंत अवस्था प्राप्त कर ली । इसके पश्चात श्रेयांसनाथ भगवान ने साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका नामक चार तीर्थो की स्थापना की और स्वयं तीर्थंकर कहलाये ।

प्रभु के संघ में 70 गणधर प्रभु थे, प्रभु के प्रथम गणधर का नाम धर्म स्वामी था । प्रभु का यक्ष कुमार देव तथा यक्षिणी गौरी थी ।  प्रभु श्रेयांसनाथ ने श्रावण कृष्ण तृतीया के दिन सम्मेदशिखर जी में निर्वाण प्राप्त किया , और इसी के साथ प्रभु ने अपने जन्म - जन्मांतरो से चले आ रहे कर्म चक्र को तोडकर निर्वाण प्राप्त किया , प्रभु ने अपने समस्त अष्ट कर्मो का क्षय कर दिया और सिद्ध कहलाये ।

" नमो सिद्धाणं "

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