मल्लिनाथ जी का जीवन परिचय

प्रभु मल्लिनाथ जी जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर है । प्रभु मल्लिनाथ जी का जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी को अश्विन नक्षत्र में इक्ष्वाकु वंश में मिथिला नगरी में हुआ था । प्रभु के पिता का नाम कुम्भ राजा तथा माता का नाम प्रभावती था । प्रभु की देह का वर्ण नीला तथा प्रतीक चिह्न कलश था।

जानिये - जैन धर्म में तीर्थंकर क्या होते हैं ?

मल्लिनाथ जी


श्वेताम्बर परम्परा में मल्लिनाथ जी

जैन धर्म में श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार मल्लिनाथ जी जैन धर्म में एकमात्र महिला तीर्थंकर थी , किसी भी धर्म में महिला धर्माचार्य का शायद यह एकमात्र उदाहरण है ।

श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार भगवती मल्लि कुमारी जी दीक्षा पश्चात् श्वेत वस्त्र को धारण किया ।

मल्लिनाथ जी महिला तीर्थंकर क्यों हुई, इसकी कथा भी विस्तार से श्वेताम्बर ग्रन्थों में उपलब्ध है ।

दिगम्बर परम्परा के अनुसार स्त्री को मोक्ष नही हो सकता है, परन्तु श्वेताम्बर परम्परा इसके एकदम विपरीत है , जैन धर्म की श्वेताम्बर परम्परा में स्त्री को भी मोक्ष की अधिकारी माना है ।

( नोट -; ये मात्र परम्परा की भिन्नता है , यहां सही व गलत की चर्चा करना उद्देश्य नही है , दोनों ही मत आदर पूर्वक बड़ी श्रद्धा से तीर्थंकर प्रभु की वदंना करते है , जैन धर्म व्यक्ति पूजा नही करता केवल गुणो की पूजा करता है , अहिंसा मूल सिद्धांत है और नवकार महामंत्र , मंत्रराज है जो अरिहंत , सिद्ध व साधुओ के गुणो को नमस्कार करता है ।)


प्रभु मल्लिनाथ जी की आयु 55,000 वर्ष थी , प्रभु के देह की ऊंचाई 25 धनुष थी । मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी को अश्वनी नक्षत्र में प्रभु ने दीक्षा ग्रहण की, प्रभु मल्लिनाथ जी का साधनाकाल मात्र 6 दिन का था । इसके पश्चात प्रभु मल्लिनाथ जी को पौष कृष्ण दूज के दिन निर्मल केवलज्ञान की प्राप्ती हुई और प्रभु पाँच ज्ञान के धारक हो गये ।

इसके पश्चात प्रभु ने साधु, साध्वी व श्रावक, श्राविका नामक चार तीर्थो को स्थापित किया और चार तीर्थो की स्थापना करने के कारण स्वयं तीर्थंकर कहलाये । प्रभु के संघ में गणधरो की संख्या 28 थी । प्रभु ने चैत्र अमावस्या के दिन सम्मेद शिखर जी में निर्वाण प्राप्त किया और प्रभु अरिहंत से सिद्ध कहलाये ।

" प्रभु मल्लिनाथ जी की जय हो "

अगर कोई त्रुटी हो या अंश मात्र भी जिन आज्ञा के विपरीत लिखा हो तो "तस्स मिच्छम्मी दुक्कड़म".



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" जय जिनेन्द्र "

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