जैन व्रत की सामान्य जानकारी

जैन धर्म में उपवास का बहुत महत्व है । प्रत्येक जैन पर्व उपवास से सम्बंधित होता है , प्रत्येक तीर्थंकर प्रभु का कल्याणक उपवास के द्वारा मनाया जाता है । उपवास कर्मो की निर्जरा का एक साधन है ।

उपवास आत्मा को शक्ति प्रदान करता है , एक शुद्ध भाव से किया हुआ उपवास अनेको वर्षो के नरक आयुष के बंधन को काट देता है ।

जैन व्रत

जब तक हमारी देह में शक्ति है तभी तक धर्म हो सकता है  , वृद्ध या रोगी शरीर में उपवास करने की क्षमता नही होती है , अतः हमारी देह ही माध्यम है, धर्म करने का, ये धर्म साधना का जरिया है, एक जैन चिंतक ये सोचकर उपवास नही करता की मै एक शरीर हूँ, वह सदैव यही चितंन करता है कि मै एक आत्मा हूं । आत्मा की स्वाभाव की स्थिती है - अनाहारक, अतः एक उपवास के द्वारा हम उसी स्थिती को पाने का प्रयास करते है ।

अगर आप स्वयं को शरीर मानेगें तब आप धर्म का मर्म नही समझ पायेंगें , आप को सिर्फ लगेगा की उपवास में भूखे मरने से क्या होगा ? परन्तु आप यह नही जानते की उपवास में निराहार रहने का आन्नद क्या होता है ? सदैव भोजन करना आन्नद नही देता , जीवन का मजा न भोजन पाने में भी है ।

आप एक उपवास करने से अन्न का महत्व जान पाते हो कि यह कितना आवश्यक है ।

अब प्रश्न उठता है कि सिर्फ अन्न का त्याग ही क्यों ?

तो वह इसलिए क्योकि अन्न से महान कुछ भी नही होता , मानव जीवन की मूलभूत और सर्वप्रथम आवश्यकता अन्न ही होता है , इसलिए उपवास में त्याग अन्न का ही होता है और यह त्याग एच्छिक होता है , मजबूरी में नही किया जाता । इसलिए सभी जैन उपवास के पहले व्रत ग्रहण करने के सूत्र पढ़े जाते है , उसके पश्चात उपवास ग्रहण किया जाता है ।

जानिये - जैन उपवास ग्रहण करने के सूत्र

(नोट -: यह post केवल सामान्य जानकारी के लिए है और इसमे मेरे निजी विचार भी शामिल है , अगर आपको कुछ भी कहना हो तो please , comment box में comment करें ।)


|| जैनम जयति शासनम् ||


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