अरिष्टनेमी जी का जीवन परिचय

प्रभु अरिष्टनेमी जी जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर है । प्रभु अरिष्टनेमी जी का अन्य नाम नेमिनाथ भी था । प्रभु अरिष्टनेमी जी का उल्लेख हिन्दू ग्रन्थों यथा वेदो और पुराणो में भी मिलता है । प्रभु अरिष्टनेमी जी भगवान श्री कृष्ण के निकट संबधी भाई थे । जैन ग्रन्थों में श्री कृष्ण जी नवें वासुदेव के रूप में उल्लेखित है। 

भगवान नेमिनाथ जी

प्रभु अरिष्टनेमी जी के काल में नवें वासुदेव श्री कृष्ण जी नवें बलदेव श्री बलराम जी और नवें तथा अंतिम प्रतिवासुदेव जरासंध जी भी हुये थे ।

वासुदेव , बलदेव तथा प्रतिवासुदेव कि जो परम्परां ग्याहरवें तीर्थंकर श्री श्रेयांसनाथ जी के समय शुरू हुई थी वह इस कालचक्र के अंतिम वासुदेव,बलदेव तथा प्रतिवासुदेव के साथ पूर्ण हुई ।

प्रभु नेमिनाथ जी का जन्म सौरिपुर में चित्रा नक्षत्र में श्रावण शुक्ल षष्ठी के दिन हुआ था । प्रभु के पिता का नाम  समुद्र विजय तथा माता का नाम शिवा देवी था ।

प्रभु अरिष्टनेमी जी का प्रतीक चिह्न शंख था , प्रभु की देह का रंग नीला था । प्रभु अरिष्टनेमी जी जन्म से ही तीन ज्ञान ( श्रुतज्ञान , मतिज्ञान,अवधिज्ञान ) के धारक थे ।

प्रभु अरिष्टनेमी जी की आयु (1000) एक हजार वर्ष की थी , प्रभु की देह की ऊंचाई 10 धनुष की थी ।

प्रभु अरिष्टनेमी जी जब कुमार अवस्था में थे तब उनका विवाह राजुल नामक राजकुमारी से तय हुआ , अपने विवाह स्थल पर पहुंचने से पहले प्रभु ने जीवो की करुण पुकार सुन सन्यास ग्रहण करने का फैसला किया ।
( जानिये - प्रभु अरिष्टनेमी और राजुल की कथा - जैन कहानी )

इसके पश्चात् प्रभु अरिष्टनेमी ने श्रावण कृष्ण षष्ठी के दिन गिरनार पर्वत पर दीक्षा ग्रहण की और दीक्षा के समय प्रभु को मनः पर्व ज्ञान की प्राप्ती हुई और प्रभु चार ज्ञान के धारक हो गये ।

प्रभु अरिष्टनेमी जी के साधनाकाल की अवधी चार वर्ष आठ माह की थी , इसके पश्चात प्रभु को निर्मल कैवलय ज्ञान की प्राप्ती हुई , प्रभु सर्वज्ञ , जिन , केवली ,अरिहंत प्रभु हो गये । प्रभु ने चार घाती कर्मो का नाश कर परम दुर्लभ कैवलय ज्ञान की प्राप्ती हुई थी । प्रभु पाँच ज्ञान के धारक हो गये ।

इसके पश्चात् प्रभु अरिष्टनेमी जी ने चार तीर्थो साधु/ साध्वी व श्रावक/ श्राविका की स्थापना की और स्वयं तीर्थंकर कहलाये । प्रभु अरिष्टनेमी जी का संघ विस्तृत था , प्रभु अरिष्टनेमी जी के संघ में गणधरो की संख्या 11 थी

इसके पश्चात प्रभु ने गिरनार पर्वत ( जूनागढ़ , गुजरात ) पर अश्विन शुक्ल एकम के दिन निर्वाण प्राप्त किया । प्रभु के मोक्ष के साथ ही प्रभु ने अष्ट कर्मो का क्षय किया और सिद्ध हो गये ।

प्रभु जन्म - मरण के भव बंधनो को काट कर हमेशा के लिए मुक्त हो गये ।


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