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जैन धर्म में तीर्थंकर क्या होते हैं ?

जैन धर्म में तीर्थंकर अरिहंत भगवान होते हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है तीर्थ की स्थापना करने वाला ।
जैन धर्म में साधु , साध्वी, श्रावक, श्राविका ये चार तीर्थ की स्थापना करने के कारण तीर्थंकर कहलाते है । जब प्रभु कैवलय ज्ञान प्राप्त करते है तब वह सर्वज्ञ हो जाते है, वे अपने चार घनघाती कर्मो का क्षय कर अरिहंत कहलाते है ।
उसके पश्चात वह धर्म की स्थापना के लिए उपदेश देते है ।  प्रभु द्वारा प्रतिपादित धर्म में जो गृहत्याग कर कठोर धर्म के पालन का प्रण लेता है तो वह पुरूष साधु तथा महिला साध्वी कहलाती है । इसी प्रकार जो गृहस्थ धर्म में रहकर हि मध्यम प्रकार से धर्म का मार्ग चुनता है तो जिन का वह अनुयायी अगर पुरुष है तो श्रावक और स्त्री है तो श्राविका कहलाती है । इस प्रकार से तीर्थंकर महाप्रभु दो प्रकार के धर्म का प्रतिपादन करते है। 1. साधु धर्म 2. श्रावक धर्म इस प्रकार इन तीर्थ कि स्थापना करने के कारण वह तीर्थंकर कहलाते है । तीर्थ अर्थात्‌ स्वयं तरने में समर्थ । जब तीर्थंकर महाप्रभु अपने समस्त कर्मो का क्षय कर लेते है तो वह निवार्ण को प्राप्त होते है अर्थात् सिद्ध भगवान कहलाते है । उदाहरण - वर्…

भगवान ऋषभदेव जी

भगवान ऋषभदेव जी इस कालक्रम में जैन धर्म के प्रवर्तक है । भगवान ऋषभदेव जी जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर है । भगवान ऋषभदेव जी को आदिनाथ भी कहा जाता है । इन्के पिता का नाम नाभिराज तथा माता का नाम मरूदेवी था । इनके पिता कुलकर व्यवस्था कें अतिंम 15 वें कुलकर थे । भगवान ऋषभदेव जी इस पृथ्वी के प्रथम राजा थे । वे प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे । इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" रखा गया था । भगवान ऋषभदेव ने असी, मसी और कृषी का निर्माण किया था । गणित और बाह्नी लिपी भी प्रभु आदिनाथ की देन है ।
प्रभु ऋषभदेव जी के 100 पुत्र तथा दो पुत्रियाँ ब्रह्मी तथा सुंदरी जी थी । भगवान ऋषभदेव जी बाहुबली जी के पिता थे , जिनकी प्रतिमा गोमतेश्वर नामक तीर्थ में स्थित है ।


जन्म भगवान ऋषभदेव जी का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था , जैन रामायण के अनुसार वह प्रभु श्री राम के पूर्वज थे । प्रभु ऋषभदेव भगवान की आयु 84 लाख पूर्व की थी ।
राजा के रूप में कार्य एक राजा के रूप में प्रभु ने इस पृथ्वी को असी, मसी, कृषी , व्यापार, गणित, ज्योतिष, अंक विद्या, चक्रवर्ती भरत को 72 कलाएं तथा बाह्नी जी को 64 कलाएँ सिखा…

श्री पार्श्वनाथ जी स्तोत्र

यह स्तोत्र जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का है । यह स्तोत्र महान चमत्कारी और कल्याणकारी है । इस स्तोत्र में विभिन्न उपमाओं द्वारा प्रभु की स्तुती कि है । कविश्री द्यानतराय
नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्रं अधीशं, शतेन्द्रं सु पूजें भजें नाय-शीशं | मुनीन्द्रं गणीन्द्रं नमें जोड़ि हाथं, नमो देव-देवं सदा पार्श्वनाथं ||१||
गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुड़ावे, महा-आग तें, नाग तें तू बचावे | महावीर तें युद्ध में तू जितावे, महा-रोग तें, बंध तें तू छुड़ावे ||२||
दु:खी-दु:ख-हर्ता, सुखी-सुक्ख-कर्ता, सदा सेवकों को महानंद-भर्ता | हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं, विषम डाकिनी विघ्न के भय अवाचं ||३||
दरिद्रीन को द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने | महासंकटों से निकारे विधाता, सबे संपदा सर्व को देहि दाता ||४||
महाचोर को, वज्र को भय निवारे, महापौन के पुंज तें तू उबारे | महाक्रोध की अग्नि को मेघधारा, महालोभ-शैलेश को वज्र मारा ||५||
महामोह-अंधेर को ज्ञान-भानं, महा-कर्म-कांतार को द्यौ प्रधानं | किये नाग-नागिन अधोलोक-स्वामी, हर्यो मान तू दैत्य को हो अकामी ||६||
तुही कल्पवृक्षं …

पुष्प का भाग्य (जैन कहानी)

भगवान महावीर की साधना का दसवां वर्ष चल रहा था। भगवान महावीर के साथ मंखली पुत्र गोशाल नाम का एक उदंड व्यक्ति भी साथ-साथ विचरण कर रहा था। मंखली पुत्र गौशाल अपने स्वभाव के कारण प्रत्येक जगह झगड़ा पैदा कर देता था, वह समस्याओं को स्वयं ही अपनी तरफ बुलाता था।
एक बार की बात है भगवान महावीर और मंखली पुत्र गौशाल सिद्धार्थपुर पहुंचे,कुछ दिन वहां रहने के पश्चात कूर्मग्राम में जा रहे थे।
रास्ते में एक तिल के पौधे को देखकर गौशाल ने पूछा "प्रभु इस पौधे का भविष्य क्या होगा ? यह पौधा उत्पन्न होगा भी या नहीं अगर उत्पन्न होगा तो एक फली में कितने दाने होंगे ?"
भगवान महावीर ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया - "यह पौधा अवश्य ही फल उत्पन्न करेगा,फूल वाले पौधे की एक फली में से सात (7) दाने निकलेंगे।"
गौशाला को प्रभु की बात पर विश्वास नहीं हुआ वह अपने स्वभाव के अनुसार प्रभु को गलत करने पर उतारू हो गया जैसे ही भगवान महावीर ने पीठ फेरी उसने उस पौधे को उखाड़ दिया और कहा जब पौधा ही नहीं रहेगा तो दाने कहां से आएंगे।
इस के पश्चात भगवान महावीर और मंखली पुत्र गौशाल कूर्मग्राम में पधारे। कुछ समय भगवान …

जैन धर्म में गणधर क्या होते हैं ?

जैन धर्म में गणधर तीर्थंकर के शिष्य होते हैं। जैन धर्म में तीर्थंकरों की संख्या 24 है, प्रत्येक तीर्थंकर के शिष्य होते हैं , जिन्हें गणधर कहा जाता है। जैन तीर्थंकरों के शिष्य गणधर कहलाते हैं। जिस प्रकार जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हैं,उसी प्रकार 24 तीर्थंकरों के कुल 1452 गणधर हुए हैं।
जैन धर्म में तीर्थंकर धर्म प्रवर्तक होते हैं वह चार तीर्थों की स्थापना करते हैं। गणधर इन्हीं चार तीर्थों को संयोकर समूह बनाते हैं। गणो को धारण करने के कारण ही वह गणधर कहलाते हैं। भगवान महावीर के समय प्रमुख कार्यों को 10 गणो में विभाजित किया गया था, इन्हीं 10 गणो के प्रमुख 11 गणधर कहलाए।
गणधरो का क्रम तीर्थंकर के पश्चात आता है ,जैन परंपरा में सबसे पहले तीर्थंकर उसके बाद गणधर और उसके बाद आचार्य आते हैं,आचार्यों के पश्चात साधु गिने जाते हैं।
गणधर जैन तीर्थंकरों के वचनों को सूत्रों में लिपिबद्ध करते हैं,भगवान महावीर के समय उनके वचनों को पूर्व (ग्रंथ का नाम)में संग्रहित किया गया था, जो आगामों का आधार बने थे।
गणधर भगवान की वाणी को सूत्रों में लिपिबद्ध करते हैं, संघ का संचालन करते हैं, कठोर आचार्य नियमों का पालन क…

जैन धर्म में तीर्थंकर क्या होते हैं ?

जैन धर्म में तीर्थंकर अरिहंत भगवान होते हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है तीर्थ की स्थापना करने वाला ।
जैन धर्म में साधु , साध्वी, श्रावक, श्राविका ये चार तीर्थ की स्थापना करने के कारण तीर्थंकर कहलाते है । जब प्रभु कैवलय ज्ञान प्राप्त करते है तब वह सर्वज्ञ हो जाते है, वे अपने चार घनघाती कर्मो का क्षय कर अरिहंत कहलाते है ।
उसके पश्चात वह धर्म की स्थापना के लिए उपदेश देते है ।  प्रभु द्वारा प्रतिपादित धर्म में जो गृहत्याग कर कठोर धर्म के पालन का प्रण लेता है तो वह पुरूष साधु तथा महिला साध्वी कहलाती है । इसी प्रकार जो गृहस्थ धर्म में रहकर हि मध्यम प्रकार से धर्म का मार्ग चुनता है तो जिन का वह अनुयायी अगर पुरुष है तो श्रावक और स्त्री है तो श्राविका कहलाती है । इस प्रकार से तीर्थंकर महाप्रभु दो प्रकार के धर्म का प्रतिपादन करते है। 1. साधु धर्म 2. श्रावक धर्म इस प्रकार इन तीर्थ कि स्थापना करने के कारण वह तीर्थंकर कहलाते है । तीर्थ अर्थात्‌ स्वयं तरने में समर्थ । जब तीर्थंकर महाप्रभु अपने समस्त कर्मो का क्षय कर लेते है तो वह निवार्ण को प्राप्त होते है अर्थात् सिद्ध भगवान कहलाते है । उदाहरण - वर्…

लेश्या (जैन धर्म)

जैन धर्म में लेश्या क्या है ? लेश्या का मतलब होता है,आत्मा का स्वभाव । आत्मा के स्वभाव से तात्पर्य है कि जिसके द्वारा आत्मा कर्मों से लिप्त होती है तथा मन के शुभ और अशुभ परिणाम को लेश्या कहते हैं।
जैन धर्म के अनुसार लेश्या 6 प्रकार की होती है। 1.कृष्ण लेश्या 2.नील लेश्या 3.कपोत लेश्या 4.तेजो लेश्या 5.पदम लेश्या 6.शुक्ल लेश्या
इसके अलावा आत्मा के जो विचार हैं उनको भाव लेश्या कहते हैं और जिन पुदगलो के द्वारा आत्मा के विचार बदलते रहते हैं, उन पुदगलो को द्रव्य लेश्या कहते हैं, लेश्या के नाम द्रव्य लेश्या के आधार पर ही रखे गए हैं।
जैन धर्म के अनुसार तीन लेश्या अशुभ फलदाई होती हैं, और वह पाप का कारण बनती हैं और 3 लेश्या शुभ फलदाई होती हैं और वह पुण्य का कारण बनती है।

जैन धर्म के अनुसार तीन अशुभ लेश्या निम्नलिखित हैं
1.कृष्ण लेश्या
2.नील लेश्या
3.कपोत लेश्या

जैन धर्म के अनुसार तीन शुभ लेश्या निम्नलिखित हैं
1. तेजो लेश्या
2. पदम लेश्या
3. शुक्ल लेश्य

इन सभी लेश्या के लक्षण होते हैं,जिस वजह से उन्हें पहचाना जाता है।
लेश्याओ के लक्ष्ण निम्नलिखत प्रकार से होते है -1. कृष्ण लेश्या- निर्दयी, पापी, जीवो …

महाविराष्टक स्तोत्र

यह स्तोत्र भगवान महावीर का है, यह स्तोत्र सब प्रकार के कष्टो का निवारण करने वाला है । इस स्तोत्र में भगवान महावीर को विभिन्न प्रकार कि उपमायें देकर मोक्ष दायक बताया है। यह स्तोत्र सभी प्रकार के पापो का नाश करने वाला है । भगवान महावीर का यह महान स्तोत्र भगवान महावीर के गुणो से युक्त है। भगवान महावीर के वचन ,प्रभु का दर्शन , प्रभु का महान प्रभाव इस स्तोत्र में बताया गया है । इस स्तोत्र के पाठ से समस्त कष्टो का नाश करने के साथ-साथ महामंगलदायी भी है ।

महाविराष्टक स्तोत्र
यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचित:,
समं भान्ति ध्रौव्य-व्यय-जनि-लसन्तोन्तरहिता: |
जगत्साक्षी मार्ग-प्रकटनपरो भानुरिव यो,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||१||

अताम्रं यच्चक्षु: कमल-युगलं स्पन्द-रहितम्,
जनान्कोपापायं प्रकटयति बाह्यान्तरमपि |
स्फुटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमयी वातिविमला,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||२||

नमन्नाकेन्द्राली-मुकुट-मणि-भा-जाल-जटिलम्,
लसत्पादाम्भोज-द्वयमिह यदीयं तनुभृताम् |
भवज्ज्वाला-शान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि,
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||३||

यदर्चा-भावेन प्रमुदित-मना दर्दुर इ…

जैन साधु नंगे पांव क्यों चलते है ?

जैन साधु नंगे पांव क्यों चलते है ?जैन साधुओं का प्रमुख धर्म है अहिंसा । मार्ग में किसी भी छोटे से जीव की विराधना न हो जाए, उन्हें किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचे इसी बात का विशेष ध्यान रखकर जैन साधु नंगे पांव चलते हैं।
जब कोई भी जैन साधु बनता है, तब वह भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित पंच महाव्रतओं का पालन करने का व्रत लेता है। पंच महाव्रतओं का पालन करने का व्रत लेने के साथ-साथ वह तीन गुप्तियो का भी पालन करता है । इतने सारे नियम और कष्टों को वह सिर्फ इसलिए सहते हैं, ताकि अहिंसा की पालना हो सके अगर कोई कहे जैन धर्म को एक शब्द में समझाओ तो उसका सीधा सा उत्तर होगा "अहिंसा" अहिंसा की व्याख्या ही जैन धर्म है। और इसी अहिंसा के पालन के लिए जैन मुनि नंगे पांव चलते हैं।
मार्ग में वह अनेकों प्रकार के कष्टों को सहते हैं, कभी उनके पैरों में शूल चुभ जाते हैं और कभी कंकड़ या कांच का टुकड़ा भी लग जाता है।

लेकिन वे ऐसा किस लिए करते हैं ?
ऐसा वे धर्म के पालन के लिए करते है । अहिंसा का पालन हि धर्म का पालन है । मार्ग में चलते हुए सुक्ष्म जीव यथा छोटे से छोटे जीव चींटी तक को भी कष्ट न हो इतनी सावधा…

भगवान महावीर और यक्ष (जैन कहानी)

भगवान महावीर और यक्षभगवान महावीर एक बार अस्तिक ग्राम पधारे,उन्होंने मंदिर के पुजारी से मंदिर में ठहरने की आज्ञा मांगी। मंदिर के पुजारी ने कहा इस मंदिर में एक बड़ा ही दुष्ट यक्ष रहता है वह दिन के समय किसी को कुछ नहीं कहता परंतु रात में जो कोई भी इस मंदिर में रहता है उसे वह यातना पूर्वक मार डालता है। प्रभु महावीर मुस्कुराए और मंदिर की तरफ चल दिए प्रभु यहां यक्ष का उद्धार करने ही तो आए थे।
रात्रि में भगवान महावीर ध्यानमगन खड़े थे, तभी वहां से किसी के हंसने की जोर से आवाज आई,वह मंदिर का दुष्ट यक्ष शूलपाणी था। शूलपाणी ने भयंकर से भयंकर आवाज निकाली । बिजली जैसी गर्जना की भयंकर अट्टहास किया,परंतु भगवान महावीर बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए।इसे देखकर यक्ष को बहुत हैरानी हुई,उसके बाद यक्ष ने विभिन्न प्रकार के जानवरों के रूप बनाये। यक्ष भयंकर सर्प बनकर भगवान महावीर को डसने लगा,तो कभी भयंकर छिपकली में बदल गया, कभी उसने सिंह का रूप बनाया और कभी भयानक से भयानक दैत्य बन गया । जैसे-जैसे रात बढ़ती गई उस यक्ष का उपसर्ग भी भयंकर से भयंकर होता गया। जब इन सब से भी बात नहीं बनी तब उसने भगवान महावीर को वेदना …

जैन धर्म में नवकार मंत्र क्या है ?

नवकार मंत्र में 9 पद होते हैं, इसलिए इसे नवकार कहा जाता है ।

नमस्कार मंत्र के 5 मुख्य पदों के कारण इसे पंच परमेष्ठी भी कहते हैं ।
नवकार मंत्र जैन धर्म का आदि मूल है इसे नमस्कार महामंत्र भी कहते हैं।

नमस्कार महामंत्र हि क्यों कहते है  ?

क्योंकि यह गुणो की पूजा करता है व्यक्तियों की नहीं।

णमोकार मंत्र इस प्रकार से है -
णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं
एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो
मंगला णं च सव्वेसिं, पढमं हवई मंगलं

नवकार मंत्र का अर्थ क्या है ?
1. णमो अरिहंताणं - अरिहंतो को नमस्कार हो।
2.णमो सिद्धाणं - सिद्धो को नमस्कार हो ।
3.णमो आयरियाणं - आचार्यो को नमस्कार हो ।
4.णमो उवज्झायाणं - उपाध्यायो को नमस्कार हो ।
5.णमो लोए सव्व साहूणं - इस लोक के सभी साधु - साध्वियो को नमस्कार हो ।
6.एसो पंच णमोक्कारो - उपरोक्त जो पाँच नमस्कार योग्य पद है ।
7. सव्व पावप्पणासणो- वह समस्त पापो का नाश करने वाले है ।
8.मंगला णं च सव्वेसिं - ये समस्त पद    मंगलदायी है ।
9.पढमं हवई मंगलं- जो भी इसे पढ़े गा वह समस्त प्रकार सें मंगल फलदायी होगा ।
नवकार मंत्र में अरिहंत…

चंदनबाला की कहानी (जैन कहानी)

भगवान महावीर कि साधना का 12 वां वर्ष चल रहा था। प्रभु ने अपने ज्ञान से देखा और जाना कि मेरे कर्मो का विशाल पर्वत अब भी विद्यमान है, और समय कम है ऐसा जानकर प्रभु महावीर ने अपनी जिंदगी का सबसे कठोर अभिग्रह किया ।  प्रभु महावीर ने असंभव शर्तो के साथ अभिग्रह ग्रहण किया ।
प्रभु महावीर ने प्रतिज्ञा कि - 1. मै उस स्त्री से भोजन भिक्षा स्वरूप लूंगा जिसका सिर मुंडा हुआ हो . 2. पांवो मे बेडिया हो . 3. तीन दिन से भूखी हो. 4. दाता का एक पैर देहली के बाहर हो और एक पैर अंदर हो . 5. भिक्षा देने के लिए उदड़ के बाकुले हो . 6. भिक्षा का समय बीत जाने पर द्वार के बीच खड़ी हो. 7. दासी हो 8. राजकुमारी भी हो 9. आंखो में आंसु के साथ चेहरे पर मुस्कान भी हो . 10. यदि ऐसा संयोग होगा तो हि मै आहार ग्रहण करूंगा अन्यथा बिना भिक्षा लिये खाली हाथ हि लौट जाँऊगा ।
प्रतिज्ञा लेने के उपरांत भगवान महावीर रोज भिक्षा के लिए निकलते थे परंतु ऐसा योग मिलना भी तो असंभव था लोगों में कौतूहल मच गया प्रभु रोज भिक्षा के लिए जाते हैं , लेकिन खाली हाथ ही वापस लौट आते हैं, ऐसा करते हुए प्रभु को 4 माह बीत गए प्रभु ने इन 4 महीनों में अन…