जैन धर्म के प्रमुख त्यौहार कौन कौनसे हैं ?

जैन त्यौहार अन्य धर्मो के त्यौहारो से पूर्णत: भिन्न होते है । जहाँ अन्य त्यौहार का मतलब उत्सव होता है , वही जैन त्यौहार आत्मा के आन्नद से साम्य रखते है ।

जैन त्यौहार आत्मिक होते है और उनका लक्ष्य आत्मा की मुक्ती से संम्बध रखता है । इसलिए किसी भी तीर्थंकर प्रभु के कल्याणक पर उपवास रखने की परम्परां है ।

अतः जैन अनुयायी उपवास के माध्यम से आत्म कल्याण करते हुये अपने अधिकांश पर्वो को मनाते है ।

यथा शक्ति एकासान , आयिंबल , उपवास या पौषध करते है ।
यहाँ यह बात आवश्यक रूप से ध्यान देने की है कि यदी श्रावक या श्राविका की इच्छा होती है तभी वह उपवास ग्रहण करते है अन्यथा बलपूर्वक या अनिच्छा से किसी को भी उपवास का पच्खान नही करवाया जाता ।

जैन अनुयायी कई तरह के त्यौहार मनाते है उनमे से निम्नलिखत प्रमुख त्यौहार है -


1. पयूर्षण पर्व - यह पर्व जैन धर्म का सबसे बडा पर्व है । यह पर्व आठ दिनों तक चलता है । मुख्य रूप से यह पर्व जैन धर्म के श्वेताम्बर अनुयायियो द्वारा मनाया जाता है । यह पर्व भाद्रपद बदी द्वादश/ त्रियोदशी से लेकर भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी/ पंचमी तक मनाया जाता है ।
(* श्वेताम्बर पंथ में तेरापंथ और स्थानकवासी पंथ के पयुर्षण पर्व में एक दिन का अतंर होता है )

2. संवत्सरी महापर्व - यह पर्व जैन धर्म का सबसे बडा त्यौहार है , जो श्वेताम्बर पंथ द्वारा पयुर्षण पर्व के अंतिम आठवें दिन पर संवत्सरी के तौर पर मनाया जाता है । यह पर्व भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी/ पंचमी के दिन मनाया जाता है । इस दिन प्रत्येक जैन श्रावक के द्वारा यथा संम्भव उपवास रखा जाता है । जैन स्थानक में जैन मुनियो के द्वारा प्रवचन किये जाते है । जैन अनुयायी यथा सम्भव उपासरे में ही पौषध व्रत ( एक दिन का साधु जीवन) ग्रहण करते है । जितना धर्म - ध्यान और अहिंसा का पालन हो सके उतना जैन अनुयायी इस दिन करते है । संवत्सरी से अगले दिन सूर्य उदय पर सभी जैन श्रावक/ श्राविका जैन साधू/ साध्वी जी अपना उपवास का पारणा (जैन उपवास खोलने की प्रकिया) डालते है और अनजाने में कि हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते है ।

3. क्षमावाणी - यह पर्व संवत्सरी के अगले दिन श्वेताम्बर जैन अनुयायियो द्वारा मनाये जाने वाला पर्व है । इस पर्व में जाने - अनजाने में कि गई गलतियो के लिए क्षमा मांगी जाती है और 'मिच्छामी दुक्कडम' कह कर क्षमा माँग ली जाती है ।
प्रत्येक जैन अनुयायी द्वारा इस दिन आलोचना सूत्र/प्रतिक्रमण
का पाठ किया जाता है और सामूहिक रूप से
"खामेमि सव्वजीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे, मित्ति मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झ न केणइ " का पाठ बोल कर सभी से क्षमा मांगी जाती है ।

4. दशलक्षण पर्व - यह पर्व जैन धर्म के दिगम्बर समुदाय द्वारा मनाया जाता है । यह पर्व श्र्वेताम्बर पर्व पर्यूषण जैसा हि होता है । इस पर्व की अवधि आठ दिन न होकर दस दिन होती है अतः यह पर्व उत्तम धर्म को दर्शाता है । दिगम्बर समुदाय के अनुसार धर्म के दस लक्षण होते है ।दस लक्षण निम्न हैं- क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, संयम, शौच, तप, त्याग, आकिंचन्य एवं ब्रह्मचर्य । यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पंचमी से लेकर भाद्रपद पूर्णिमा तक मनाया जाता है । इन दस लक्षण पर्व में प्रथम दिन उत्तम क्षमा, दूसरे दिन उत्तम मार्दव, तीसरे दिन उत्तम आर्जव, चौथे दिन उत्तम सत्य, पाचवें दिन उत्तम शौच, छठे दिन उत्तम संयम, सातवें दिन उत्तम तप, आठवें दिन उत्तम त्याग, नौवें दिन उत्तम आकिंचन तथा दसवें दिन ब्रह्मचर्य तथा अंतिम दिन क्षमावाणी के रूप में मनाया जाता है ।

4. पड़वा ढोक - यह पर्व श्र्वेताम्बर समाज के क्षमावाणी पर्व के समान है । यह पर्व जैन दिगम्बर समाज में क्षमावाणी के तौर पर मनाया जाता है । यह त्योहार दसलक्षण पर्व के समाप्त होने पर अगले दिन यानी अश्विन कृष्ण एकम के दिन मनाया जाता है ।

5. महावीर जयंती - यह पर्व जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर प्रभु महावीर के जन्म कल्याणक के तौर पर मनाया जाता है । इस दिन यथा सम्भव जैन अनुयायीयो के द्वारा उपवास रखे जाते है । यह पर्व चैत्र शुक्ल त्रियोदशी के दिन मनाया जाता है ।


6. ऋषभदेव जयंती - यह पर्व इस काल में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी के जन्मकल्याणक के रूप में मनाया जाता है । यह पर्व चैत्र कृष्ण अष्टमी के दिन मनाया जाता है ।


7. सुगंध दशमी - यह पर्व जैन धर्म के मंदिरमार्गी ( ऐसे जैन जो तीर्थंकर प्रभु की प्रतिमा को पूजते है ) के द्वारा मनाया जाता है । यह पर्व भाद्रपद शुक्ल दशमी के दिन जैन मंदिरो में विभिन्न सुंगधित सामग्री के द्वारा सुगंध कर मनाया जाता है ।




8. रक्षाबंधन - जैन धर्म के अनुयायी यह पर्व विष्णु कुमार मुनी के कारण मनाते है जिन्होंने 700 मुनियो का उपसर्ग दुर किया था ।


9. दीपावली - जैन धर्म में दीपावली का पर्व भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के तौर पर मनाते है । यह पर्व कार्तिक अमावस्या को मनाया जाता है । इसी दिन गौतम स्वामी जी को कैवलय ज्ञान की प्राप्ती भी हुई थी ।


10. वीर शासन जयंती - यह पर्व जैन धर्म के कैलण्डर के नववर्ष का प्रथम दिन होता है जो दीपावली के अगले दिन सो प्रारम्भ होता है ।

इसके अलावा रोज तीज, अक्षया तृतीया ( इस दिन वर्षीतप रखने वाले अनुयायी,वर्ष के उपवास का पारणा डालते है )
अष्टाहिंका पर्व,रत्नात्रय व्रत आदी अनेको त्यौहार है ।

इस प्रकार से जैन त्यौहार/पर्व का सम्बंध आत्मा में सुधार लाकर जीव के भव बंध की मुक्ती से है ।

अगर कोई त्रुटी हो तो 'तस्स मिच्छामी दुक्कडम'.
'जय जिनेन्द्र'.


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" जय जिनेन्द्र ".

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