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विमलनाथ

प्रभु विमलनाथ जी जैन धर्म के 13वें तीर्थंकर है । प्रभु का जन्म माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन काम्पिलय नगरी में इक्ष्वाकु कुल में हुआ था । प्रभु विमलनाथ जी के पिता का नाम कृतवर्मन तथा माता का नाम श्यामा था । प्रभु की देह का वर्ण स्वर्ण और इनका प्रतिक चिह्न वाराह था ।

प्रभु विमलनाथ जी की आयु 60,000,00 वर्ष थी । प्रभु के देह की ऊंचाई 60 धनुष थी । 

भगवान विमलनाथ ने माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन गृह त्याग कर दीक्षा ग्रहण की प्रभु का साधना काल तीन वर्ष का था । तीन वर्ष पश्चात माघ शुक्ल छठ के दिन प्रभु को निर्मल कैवलय ज्ञान की प्राप्ती हुई । प्रभु पाँच ज्ञान के धारक हो गये , इसके पश्चात प्रभु ने साधु, साध्वी व श्रावक, श्राविका नामक चार तीर्थो को स्थापित किया और चार तीर्थो की स्थापना करने के कारण स्वयं तीर्थंकर कहलाये । 

प्रभु विमलनाथ के समसवरण में 55 गणधर थें । प्रभु ने आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को सम्मेद शिखरजी से मोक्ष प्राप्त किया , प्रभु का निर्वाण सम्मेद शिखरजी से  हो गया । 
" प्रभु विमलनाथ जी की जय "

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" जय जिनेन्द्र ".


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