🌍 क्या यह संसार मिथ्या है? जानें गणधर व्यक्तस्वामी जी और उनके 500 शिष्यों की सत्य कथा!
भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण से जैन धर्म के चतुर्थ गणधर बनने का अद्भुत सफर...
व्यक्तस्वामी जी भगवान महावीर के चतुर्थ गणधर (चौथे मुख्य शिष्य) थे। वे कोल्लाग सन्निवेश के भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण थे। उनकी माता का नाम वारुणी और पिता का नाम धनमित्र था।
व्यक्तस्वामी जी ने अपने 500 शिष्यों के साथ 50 वर्ष की अवस्था में भगवान महावीर से श्रमण-दीक्षा ग्रहण की। इन्होंने 12 वर्ष तक छद्मस्थ साधना की और उसके बाद केवलज्ञान प्राप्त किया।
वे 18 वर्ष तक केवली अवस्था में रहकर धर्म की प्रभावना करते रहे। उन्होंने भगवान के जीवनकाल में ही एक मास के अनशन (तप) के माध्यम से 80 वर्ष की आयु में मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त की।
❓ व्यक्तस्वामी जी की गहरी शंका: जगत् या पंचभूत?
दीक्षा से पूर्व व्यक्तस्वामी जी के मन में संसार की वास्तविकता को लेकर बड़ा संदेह था। वे वेदों के ज्ञाता थे, लेकिन एक प्रश्न उन्हें सदा व्याकुल करता था:
व्यक्तस्वामी जी को शंका थी कि: "क्या ब्रह्म के अतिरिक्त सारा जगत् मिथ्या है? और क्या पंचभूत आदि तत्वों का वास्तव में अस्तित्व है या नहीं?"
जब वे भगवान महावीर के समवशरण में पहुँचे, तो प्रभु ने उन्हें समझाया कि यह जगत् कथंचित् सत्य है और पंचभूतों का अस्तित्व प्रत्यक्ष है। प्रभु के तर्कों से संतुष्ट होकर उन्होंने अपने 500 शिष्यों सहित जिन-दीक्षा स्वीकार की।
🚩 महावीर के सभी 11 गणधरों की अद्भुत गाथा
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