नमिनाथ जी का जीवन परिचय

प्रभु नमिनाथ जी जैन धर्म के 21वें तीर्थंकर है । प्रभु नमिनाथ जी का जन्म मिथिला के इक्ष्वाकु वंश में श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अश्विनी नक्षत्र में हुआ था। इनकी माता का नाम विप्रा रानी देवी और पिता का नाम राजा विजय था।


प्रभु नमिनाथ जी का प्रतीक चिह्न नील कमल था । प्रभु की देह का रंग सुनहरा था । प्रभु नमिनाथ जी जन्म से ही तीन ज्ञान (श्रुतज्ञान, मतिज्ञान , अवधिज्ञान ) के धारक थे ।


नेमिनाथ जी

प्रभु नमिनाथ जी की आयु 10,000 वर्ष थी और उनकी देह की ऊँचाई 15 धनुष थी ।
 
इसके पश्चात प्रभु ने आषाढ कृष्ण दशमी के दिन दीक्षा ग्रहण की , दीक्षा के समय प्रभु को मनः पर्व ज्ञान की प्राप्ती हुई और प्रभु चार ज्ञान के धारक हो गये ।

प्रभु नमिनाथ जी के साधनाकाल की अवधी 9 माह की थी । 9 माह के पश्चात मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन प्रभु को निर्मल कैवलय ज्ञान की प्राप्ती हुई , प्रभु सर्वज्ञ , जिन , केवली ,अरिहंत प्रभु हो गये ।


प्रभु ने चार घाती कर्मो का नाश कर परम दुर्लभ कैवलय ज्ञान की प्राप्ती हुई थी । प्रभु पाँच ज्ञान के धारक हो गये ।

इसके पश्चात् प्रभु नमिनाथ ने चार तीर्थो की साधु/ साध्वी व श्रावक/ श्राविका की स्थापना की और स्वयं तीर्थंकर कहलाये । प्रभु का संघ विस्तृत था , प्रभु मुनिसुव्रत के संघ में गणधरो की संख्या 17 थी ।


इसके पश्चात प्रभु ने सम्मेद शिखरजी में वैशाख कृष्ण चर्तुदर्शी के दिन निर्वाण प्राप्त किया । प्रभु के मोक्ष के साथ ही प्रभु ने अष्ट कर्मो का क्षय किया और सिद्ध हो गये ।

प्रभु जन्म - मरण के भव बंधनो को काट कर हमेशा के लिए मुक्त हो गये ।


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