🔥 कर्मों का रहस्य: आखिर क्यों विद्वान अग्निभूति को 'कर्म सिद्धांत' पर हुआ संदेह?
गौतम स्वामी के भाई और महावीर के द्वितीय गणधर अग्निभूति जी की अद्भुत गाथा...
गणधर अग्निभूति जी श्रमण भगवान महावीर के द्वितीय गणधर (शिष्य) थे। वे प्रथम गणधर गौतम स्वामी जी के सहोदर (सगे) भाई थे। अग्निभूति जी ने 500 छात्रों के साथ 46 वर्ष की आयु में भगवान महावीर स्वामी की शरण में मुनि-धर्म अंगीकार किया था।
अग्निभूति जी ने 12 वर्ष तक छद्मस्थ भाव में कठोर तपस्या की और उसके बाद **केवलज्ञान** प्राप्त किया। 16 वर्ष केवली पर्याय में रहने के उपरांत, उन्होंने भगवान के जीवनकाल में ही गुणशील चैत्य में एक मास के अनशन (तप) द्वारा मुक्ति प्राप्त की। उनकी पूर्ण आयु 74 वर्ष की थी।
❓ अग्निभूति जी की शंका: कर्म का खेल
दीक्षा लेने से पहले अग्निभूति जी एक विद्वान ब्राह्मण थे। उनके मन में कर्मों को लेकर एक गहरा संशय था, जिसे केवल सर्वज्ञ ही मिटा सकते थे।
अग्निभूति जी को शंका थी कि: "क्या कर्म सिद्धांत वास्तव में होता है या नहीं?"
जब वे भगवान महावीर के समवशरण में पहुँचे, तो प्रभु ने उनके मन की बात जान ली और तर्क के साथ कर्म सिद्धांत का ऐसा वर्णन किया कि अग्निभूति जी नतमस्तक हो गए और वहीं दीक्षा ग्रहण की।
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