गणधर वायुभूती जी का जीवन परिचय

💎 शरीर और जीव का रहस्य: वायुभूति जी की वह शंका जिसे महावीर ने सुलझाया!

इंद्रभूति और अग्निभूति के भाई, भगवान महावीर के तृतीय गणधर की अनकही कहानी...


वायुभूति जी भगवान महावीर के तृतीय गणधर (तीसरे मुख्य शिष्य) थे। ये जैन धर्म के प्रथम गणधर इंद्रभूति गौतम और द्वितीय गणधर अग्निभूति गौतम के सहोदर भाई थे।

वायुभूति जी ने 42 वर्ष की आयु में भगवान महावीर की शरण में दीक्षा ग्रहण की। इन्होंने 10 वर्ष तक छद्मस्थ भाव में घोर साधना की और फिर **केवलज्ञान** की प्राप्ति की।

केवलज्ञान प्राप्त करने के बाद, वायुभूति जी 18 वर्ष तक केवली रूप में धर्म का प्रचार करते रहे। उन्होंने भगवान महावीर के निर्वाण से 2 वर्ष पूर्व, 70 वर्ष की आयु में एक मास के अनशन के द्वारा **निर्वाण (मोक्ष)** प्राप्त किया।

❓ वायुभूति जी की शंका: क्या जीव और शरीर एक हैं?

दीक्षा से पूर्व वायुभूति जी एक प्रकांड विद्वान ब्राह्मण थे। उनके मन में एक बहुत बड़ी शंका थी जिसने उन्हें महावीर के चरणों में ला खड़ा किया।

वायुभूति को शंका थी कि: "क्या जीव (आत्मा) और शरीर एक ही हैं या ये दोनों पृथक (अलग) हैं?"

प्रभु महावीर ने अपनी दिव्य वाणी से यह स्पष्ट किया कि जीव अविनाशी है और शरीर नश्वर। इस समाधान को पाते ही वायुभूति जी ने अपनी शंका त्याग दी और भगवान के तृतीय गणधर के रूप में विख्यात हुए।

॥ इति ॥

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